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सत्संग परिचर्चा में सभी भक्तगणों ने शरद पूर्णिमा के महत्व एवं कार्तिक मास के महत्व को जाना

सत्संग परिचर्चा में सभी भक्तगणों ने शरद पूर्णिमा के  महत्व एवं कार्तिक मास के महत्व को जाना



ऑनलाइन सत्संग का आयोजन सीता रसोई संचालन ग्रुप में श्री राम बालक दास जी के द्वारा प्रतिदिन किया जाता है आज के सत्संग परिचर्चा में सभी भक्तगणों ने शरद पूर्णिमा के  महत्व एवं कार्तिक मास के महत्व को जाना

         सत्संग परिचर्चा में कार्तिक मास की महत्व को बताते हुए संत श्री ने कहा कि, कार्तिक मास का स्नान हमारी अति प्राचीन परंपरा है,  कहा जाता हैँ की  इस माह में जो भी व्यक्ति सुबह 4:00 बजे उठकर शीत का सेवन करता है, तो वह बारहों  महीना बीमार नहीं पड़ता सुबह-सुबह शीत वाली घास पर चलिए ठंडी हवा का सेवन कीजिए ठंडी हवा से निर्मित कोहरे को हृदय ओर सांस   में जाने दीजिए ये आपके शरीर का निर्माल्य कर देगा सुबह 4:00 बजे आलस्य का त्याग करके उठिए एक महीना स्नान कीजिए, भजन कीजिए योगा कीजिए आपका शरीर की स्फूर्ति व स्वास्थ्यवर्धक सेहत पूरे साल बना रहेगा, यही इस कार्तिक मास की महिमा है और इसलिए इसे हमारे धर्म से जोड़ दिया गया है ताकि आप इस महत्वपूर्ण माह का उपयोग अपने स्वास्थ्य एवम स्वाध्याय हेतु कर सके

             प्रतिदिन ऋचा बहन द्वारा सुंदर सुविचार का प्रेषण ग्रुप में किया जाता है इन्हीं विचार को विस्तार करते हुए बाबा जी ने बताया कि, तुलसीदास जी कहते हैं कि दूसरों की निंदा करने से बड़ा कोई भी पाप नहीं है दूसरों की बुराई को देखो पर उसका बखान ना करो क्योंकि ऐसा करने से हम हमारा ही समय नष्ट करते हैं हमारे मन मस्तिष्क का एक कोशिका उसी में उलझ कर रह जाती है, हम कोशिश कर सकते हैं कि उसे सुधारें और उसे  सदज्ञान दे और जब आपको ऐसा लगे कि वह आपको समझने को तैयार नहीं तो उसे वैसे ही जीवन जीने दे क्योंकि उसे समझाना भी अपना कीमती समय व्यर्थ करना है अतः किसी दूसरे व्यक्ति की आलोचना करने से पहले हमें अपने अंदर झांक कर देख लेना चाहिए

          रामफ़ल जी द्वारा शरद पूर्णिमा के महत्व को स्पष्ट करने की विनती बाबाजी से की गई, शरद पूर्णिमा के महत्व को वर्णित करते हैं बाबा जी ने बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण आकार में होता है शरद पूर्णिमा की रात्रि वर्ष की सबसे बड़ी रात्रि मानी गई है कहते हैं चंद्रमा को जिस कलंक का श्राप मिला हुआ था उस से मुक्ति पाने के लिए चंद्रमा ने श्री कृष्ण भगवान से प्रार्थना की, भगवान श्री कृष्ण ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए उनसे कहा कि आपको मिले हुआ श्राप से आप मुक्त तो नहीं हो सकते, आपके वक्ष स्थल पर दाग बना रहेगा, जिससे आप निष्कलंक और बेदाग नहीं रह पाएंगे और चंद्रमा में दाग है यह सभी कहेंगे परंतु वर्ष में  एक दिन  शरद पूर्णिमा  को आप पूर्ण रूप से  बेदाग होंगे और सबसे सुंदर रूप में पूर्ण आकार में दिखाई देंगे, आज के दिन आप समुद्र को गति प्रदान करेंगे आज ही के दिन समुद्र अपनी गति बदल देता है  चन्द्रमा समुद्र के संतुलन को बनाए रखने हेतु अपनी तेज किरणें बिखेरते हैं, इन्हीं तेज किरणों को कहा जाता है कि आज के दिन अमृत वर्षा होती है, 

      परंतु हम समझने का प्रयत्न करते हैं कि अमृत वास्तव में है क्या, जिसे पाने के लिए देव दानव घोर तपस्या करते हैं, समुद्र मंथन किया गया देव दानव  के बीच युद्ध हुआ शिव भगवान को विष का पान करना पड़ा विष्णु भगवान को मोहिनी रूप लेना पड़ा, वास्तव में वह अमृत, संसार में विद्यमान जीवन ही है, इसके शब्द संधि अ +मृत से ही स्पष्ट हो जाता है कि जिसकी मृत्यु ना हुई हो, अर्थात जो जीवित है वही अमृत है और जो मर गया वह मृत है, इस प्रकार हम स्वयं अमृत है और उसे यहां वहां ढूंढ रहे हैं, हर प्राणी में  अमृत ग्रंथि के रूप में विद्यमान होता है परंतु वह उसे नहीं जान पाता उसे योग साधना द्वारा कुंडली जागरण द्वारा ऋषि संत महात्मा प्राप्त कर  पाते हैं जो व्यक्ति भोग विलास में जीवन गुजार देता है वह अपने अंदर के अमृत में डुबकी नहीं लगा पाता और इसी तरह वह अपना जीवन व्यतीत कर के मर भी जाता है और उसकी अमृत ग्रंथि भी उसके साथ चली जाती है

                 तो आज हम इस शरद पूर्णिमा  अमृत बेला में यह प्रण ले की अपने जीवन में अमृत ग्रंथि जो हम में है हम उसका जागरण करेंगे आप अपने आत्म तत्व के आनंद को,  अपने हृदय की विशालता, अपने दिल की उदारता, अपने भीतर दया,  प्रेम, एक दूसरे के प्रति भाईचारा सद्भावना को, अपने मानवता, अपने हिंदू धर्म को  अमृत मान  ले तो मृत्यु का कभी भी भय नहीं रहेगा और आप अमर हो जाएंगे

                    ऋचा बहन ने प्रश्न किया कि हमें जीवन में शांति पाने के लिए क्या जतन करने चाहिए भाई, इस विषय को स्पष्ट करते बाबा जी ने बताया कि यदि हमें जीवन में शांति पाना है तो ओम को ग्रहण करना होगा, ओम आपके जीवन में जब समाहित  होगा तो आप को हृदय से ही नहीं तन से भी  स्वच्छ रूप में रहना होता है आप अपने शरीर की शुद्धि करिए प्रतिदिन शुद्ध वस्त्र धारण करिए, सत्य सनातन धर्म  का पालन करते हुए पवित्र   भोजन ग्रहण करिए अपने विचारों की शुद्धि कीजिए, अपने कल्याण के साथ-साथ दूसरों के कल्याण की भावना भी हृदय में रखिए, आप इन गुणों से पूर्ण होंगे तो ओम के साथ आपको शांति भी प्राप्त होगी

                 ग्रुप में प्रश्न किया गया कि ईर्ष्या कैसे उत्पन्न होती है और इससे कैसे बचा जा सकता है, इसका समाधान  बताते हुए  बाबा जी ने कहा कि जैसे लोभ  का  निराकरण हेतु संतोष को धारण करना चाहिए, मोह से बचने हेतु आसक्ति से बचें, माया से बचना है तो भक्ति की शरण ले, और अज्ञान से बचना है तो गुरु की शरण में जाएं और ईर्ष्या से बचना है तो सर्वप्रथम जो आपको मिला है उसमें संतुष्ट रहें दूसरों के जीवन को देखकर अपने सुख को  विस्मित  ना करें, 

           संतोष श्रीवास जी ने भगवान श्री कृष्ण को 16 कलाओं से युक्त भगवान कहलाने की कथा के विषय में पूछा, इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बाबा जी ने बताया कि, जिस प्रकार दूज के दिन चंद्रमा का महत्व होता है क्योंकि वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है उसी प्रकार अमावस्या के चांद का भी महत्व है क्योंकि अमावस्या के दिन चंद्रमा शीतल दुग्ध देकर अन्न  को पोषित करते हैं उसी तरह पूर्णिमा के चांद का भी महत्व होता है उन्हें पूर्ण कला से युक्त चंद्रमा मानकर उन्हें अर्ध देकर पूजा जाता है, इसी तरह शरद पूर्णिमा के दिन भी चंद्रमा का विशेष महत्व होता है क्योंकि आज के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से युक्त होता है और उसका आकार भी सबसे बड़ा होता है इसी चंद्रमा से श्री कृष्ण भगवान की सुंदरता की तुलना की गई है और उन्हें 16 कलाओं से युक्त भगवान का अवतार माना गया है

                 विजय कुमार साहू जी ने निधिवन में भगवान श्री कृष्ण जी की रासलीला आज ही के दिन की गई थी इस विषय पर प्रकाश डालने की विनती की, भगवान श्री कृष्ण प्रेम की प्राप्ति हेतु हजारों वर्ष पूर्व ऋषि-मुनियों ने घोर तपस्या की जिसके फलस्वरूप उन्हें गोपी रूप प्राप्त हुआ भगवान श्रीकृष्ण ने उनका उद्धार करने के लिए आज के दिन निधिवन में रास लीला रचाई जिसमें देवी देवता भी रूप बदलकर स्वयं शिव भगवान भी इसमें सम्मिलित है, रासलीला में सम्मिलित हुए

       पाठक  परदेसी जी ने प्रश्न किया कि भगवान की भक्ति किस प्रकार की जाए निष्काम की सकाम, 

 जिस प्रकार आप प्रेम करते हैं तो वहां पर कोई स्वार्थ नहीं होता उसी प्रकार भक्ति का भी रूप होता है भक्ति प्रेम भाव की होती है भगवान से जब भी आप प्रेम करे तो उसमें स्वार्थ नहीं होना चाहिए इसीलिए कभी भी निष्काम भक्ति करनी चाहिए जब भगवान स्वयं आपके हैं तो वह अवश्य रूप से आपकी हर मनोगत भाव को जानते है इसलिए भगवान से कभी कुछ ना मांगते हुए निष्काम भाव की भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है।

  

 

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