दूसरे को सजा देना वास्तव में अपने को सजा देना हो जाता है ।किसी की कमी को अपने चित् पर रखना अर्थात अपने को कमजोर बनाना --ब्रह्मा कुमार नारायण भाई
दूसरे को सजा देना वास्तव में अपने को सजा देना हो जाता है ।किसी की कमी को अपने चित् पर रखना अर्थात अपने को कमजोर बनाना --ब्रह्मा कुमार नारायण भाई
अलीराजपुर
,कर्म की गति इतनी बलबान है कि सामने हीरे की पोटली हो पर कर्म श्रेष्ठ नहीं तो हीरे भी पत्थर नज़र आयेंगे, यही होता है जब ईश्वर अवतरण का संदेश हमें मिलता है, सभी इस ज्ञान को नहीं पकड़ सकते तब तक जब तक भक्ति या पुण्य का खाता जमा न हो! मन साफ़ होगा तो ही ज्ञान मन में बैठता है अन्यथा नहीं। यदि हम किसी की कमी का बार बार चिंतन या चिंता करते हैं तो हम उस आत्मा में उस कमी को और पक्का कर रहे हैं क्योंकि आपकी वाइब्रेशन उस आत्मा को निरंतर पहुंच रही है इसलिए यदि अपनो को सुधारना चाहते हैं तो उनके लिए अच्छा सोचें और दुआएं दें, इस से वह आत्मा सशक्त होगी और अपने उपर काम कर अपनी हर कमजोरी को निकाल सकेगी।
योग कोई सन्यास नहीं बल्कि अपनी रोज़मर्रा की जिन्दगी में पवित्रता लाने का तरीका है और हमें यह ज्ञात है कि जो प्योर है वही चिरकाल तक टिक सकता है जो प्योर नहीं उसमें न आनन्द है और न ही अधिक देर तक टिकने की क्षमता इसलिए योग से जीवन में स्थिरता आती है, भटकाव बन्द होता है, मन शान्त व स्थिर होने लगता है स्वयं पर नियन्त्रण आता है जिससे जीवन को सही दिशा देने की ताकत आती है।
किसी के लिए भी मन में कोई हीन भावना न रखें क्योंकि इससे केवल आपको नुक्सान होता है, हम ऐसा करके अकसर दूसरों को सज़ा देना चाहते हैं पर वास्तव में सज़ा खुद को ही हो जाती है, कोई भी गलत भावना पहले हमारी एनर्जी को कम करती है जिससे शरीर रोगी बनता है और यही हीन भावना, हमसे गलत सोच, बोल व कर्म द्वारा हमारे पुरुषार्थ और भाग्य पर भी ताला लगाती है। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रह्माकुमार नारायण भाई ने दीपा की चौकी में स्थित ब्रह्माकुमारी सभागृह में कोई को सजा देने से पहले सोचें इस विषय पर नगर वासियों को संबोधित करते हुए बताया कि क्षमा का दूसरा रूप है शुभ भावना ,शुभ कामना ! अगर किसी व्यक्ति ने गलती की तो उसको समाकर ,उसके प्रति शुभ भावना और शुभ कामना रखें कि भगवान उन्हें सद्बुद्धि दें। नेगेटिव को पॉज़िटिव में बदलकर उसके प्रति दया और शुभ भावना रखना ही क्षमा करना है।
इसे ही भगवान शुभ चिंतन और शुभ चिंतक कहते हैं। यह दोनों हमारे में होंगे तो दूसरों के अवगुण हमारे चित्त पर ठहरेंगे नही इसे मिटाने का एक और तरीका है ,ईश्वरिय स्मृति अर्थात परमात्मा की याद। जैसे रिकॉर्ड की हुई टेप पर जब दूसरी रिकॉर्डिंग करेंगे तब पुराना अपने आप मिट जाता है ,उसी प्रकार पुरानी बातों को ,संस्कारो को मिटाने के लिए ईश्वर की स्मृति करो ,ईश्वर के गुणो की स्मृति करो ,उन गुणो को अपने मे धारण करो तो वो पुरानी बातें मिट जाती है और हमारे में परिवर्तन आता जाएगा।


