आज का चिंतन(सुविचार) - fastnewsharpal.com
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आज का चिंतन(सुविचार)

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💠 *Aaj_Ka_Vichar*💠

🎋 *..06-01-2021*..🎋


✍🏻किसी को खुश करने का मौका मिले तो खुदगर्ज ना बन जाना बड़े नसीब वाले होते है वो, जो दे पाते है मुस्कान किसी चेहरे पर।

💐 *Brahma Kumaris* 💐

🌷 *σм ѕнαитι*🌷

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  💥 *विचार परिवर्तन*💥


✍🏻गलत व्यक्ति कितना भी मीठा बोले, एक दिन आपके लिए बीमारी बन जाएगा, अच्छा व्यक्ति कितना भी कड़वा लगे, एक दिन औषधि बन कर काम आएगा।

🌹 *σм ѕнαитι.*🌹

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अनमोल वचनः

पैर में से काँटा निकल जाए तो चलने में मज़ा आता है और मन में से अहंकार निकल जाए तो जीवन जीने में मज़ा आता है़ |चलने वाले पैरों में कितना फर्क है, एक आगे है तो एक पीछे,पर न तो आगे वाले को अभिमान है और न ही पीछे वाले को अपमान । क्योंकि उन्हें पता है कि पल भर में ये बदलने वाला है,इसी को जिन्दगी  कहते है़........  

🙏ओम् शांति🙏

🍁आपका दिन शुभ हो🍁

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👏🌹😊अनमोल मोती-
इस दुनिया में हर पल, हर दिन अनगिनत कितनी ही बातें और कर्म लोगों के द्वारा किये जा रहे हैं, लेकिन समझ की कमी होने के कारण ज्यादातर लोग, अपने जीवन में घटित हुई बहुत सी अप्रिय बातों को,जो सिर्फ एक बार घटित हुई हो, उसे जीवन भर याद कर, खुद को बार -बार तकलीफ पहुंचाते रहते हैं, 
*ओम शांति, सुप्रभात*
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 *पाप और पुण्य की गहन गति*

      समय प्रमाण अब व्यर्थ की बातों को छोड समर्थी स्वरूप बनो। ऐसे विश्व सेवाधारी बनो।

इतना बडा कार्य जिसके लिए निमित्त बने हुए हो उसको स्मृति में रखो। इतने श्रेष्ठ कार्य के लिए

आगे स्वयं के पुरुषार्थ में हलचल वा स्वयं की कमजोरियाँ क्या अनुभव होती हैं? अपनी

कमजोरियाँ, इतने विशाल कार्य के आगे क्या अनुभव करते हो, अच्छी लगती हैं वा स्वयं से

ही शर्म आता है? चैलेन्ज और प्रैक्टिकल समान होना चाहिए। नहीं तो चैलेन्ज और प्रैक्टिकल

में महान अन्तर होने से सेवाधारी के बजाए क्या टाइटल मिल जायेगा? ऐसे करने वाली आत्मायें अनेक आत्माओं को वंचित करने के निमित्त बन जाती, पुण्य आत्मा के बजाए बोझ वाली

आत्माएं बन जाती हैं - इस पाप और पुण्य की गहन गति को जानो। पाप की गति श्रेष्ठ भाग्य से

वंचित कर देती। संकल्प द्वारा भी पाप होता है। संकल्प के पाप का भी प्रत्यक्षफल होता है।‌ संकल्प में स्वयं की कमजोरी, किसी भी विकार के वशीभूत वृत्ति है तो यह भी महापाप है, किठी अन्य आत्माओं के प्रति व्यर्थ बोल भी पाप के खाते में जमा होता है। ऐसे ही कर्म अर्थात् सम और सम्पर्क द्वारा किसी के प्रति शुभ भावना के बजाए और कोई भी भावना है तो यह भी का खाता जमा होता है - क्योंकि यह भी दुःख देना है। *शुभ भावना पुण्य का खाता बढाती है। व्यर्थ भावना वा घृणा की भावना वा ईष्या की भावना पाप का खाता बढ़ाती है।* इसलिए बाप के बच्चे बने, वर्से के अधिकारी बने अर्थात् पुण्य आत्मा बने, यह निश्चय, यह नशा तो बहुत अच्छा। लेकिन नशा और ईर्ष्या मिक्स नहीं करना। बाप के बनने के बाद प्राप्ति अनगिनत है लेकिन पुण्य आत्मा के साथ पाप का बोझ भी सौ गुना के हिसाब से है। इसलिए इतने अलबेले भी मत बनना। बाप को जाना और वर्से को जाना, ब्रह्माकुमार कहलाया- इसलिए अब पुण्य ही पुण्य है, पाप तो खत्म हो गया वा सम्पूर्ण बन गये ऐसी बात न सोचना - ब्रह्माकुमार

जीवन नियमों को भी ध्यान में रखो। मर्यादायें सदा सामने रखो। पुण्य और पाप दोनों का ज्ञान वुद्धि में रखो। चेक करो पुण्य आत्मा कहलाते हुए मन्सा-वाचा-कर्मणा कोई

पाप तो नहीं किया, कौन-सा खाता जमा हुआ - किसी भी प्रकार की चलन द्वारा बाप वा नालेज का नाम बदनाम तो नहीं किया। वाप के पास तो हरेक का खाता स्पष्ट है। लेकिन स्वयं

के आगे भी स्पष्ट करो। अपने आपको चलाओ मत अर्थात् धोखा मत दो - यह तो होता ही है, वह तो सव में हैं! भले सव में हो लेकिन मैं सेफ हूँ - ऐसी शुभ कामना रखो - तव विश्व सेवाधारी वन सकेंगे। संगठित रूप में एकमत, एकरस स्थिति का अनुभव करा सकेंगे। अब तक भी पाप का खाता जमा होगा तो चुक्तू कब करेंगे, अन्य आत्माओं को

पुण्य आत्मा बनाने के निमित्त कैसे बनेंगे। इसलिए अलबेलेपन में भी पाप का खाता बनाना बन्द करो। सदा पुण्य आत्मा भव का वरदान लो। अज्ञानी लोग यह स्लोगन कहते - बुरा न सुनो, न देखो, सोचो - अब बाप कहते व्यर्थ भी न सुनो, न सुनाओ और न सोचो। सदा शुभभावना से सोचो, शुभ व्यर्थ को भी शुभ-भाव से सुनो - जैसे साइन्स के साधन बुरी चीज को परिवर्तन

कर अच्छा बना देते, रूप परिवर्तन कर देते तो आप सदा शुभचिंतक, सर्व आत्माओं के बोल के भाव को परिवर्तन नहीं कर सकते? सदा भाव और भावना श्रेष्ठ रखो तो सदा पुण्य आत्मा बन जायेंगे!

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