जीवन जीने की कला-- संसार से मिलने वाली खुशी जितनी ज्यादा उतना ही दुख भी ज्यादा होगा* संसार की सबसे मूल्यवान चीज खुशी-खुशी नहीं तो सब कुछ होते हुए भी बेकार है --- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई
जीवन जीने की कला-- संसार से मिलने वाली खुशी जितनी ज्यादा उतना ही दुख भी ज्यादा होगा*
संसार की सबसे मूल्यवान चीज खुशी-खुशी नहीं तो सब कुछ होते हुए भी बेकार है --- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई
अलीराजपुर,
, मनुष्य"साधनो" से महान नही बनता है, लेकिन अपने सद्गुणों के कारण महान" बनता है, और सद्गुण अर्थात श्रेष्ठ गुण परमात्मा के साथ योग लगाने से ही आ सकते हैं.Iठीक इसी प्रकार से मनुष्य बड़े भवनो" से महान नही बनता , लेकिन सभी के लिए श्रेष्ठ भावना रखने" से महान बनता है ।जिस इंसान के कर्म अच्छे होते है,उस के जीवन में कभी अँधेरा नहीं हो सकता है.
विचार करे संसार से मिलने वाली खुशी ज्यादा देर टिकने वाली नही है क्योकि संसार ही टिकने वाला नही है। संसार हर पल बदल रहा है तो उस बदलने वाले संसार से मिली हुई खुशी कैसे स्थिर रह सकती है।संसार से मिलने वाली खुशी जितनी ज्यादा होगी उस खुशी मे दुख की सम्भावना भी उतनी ही ज्यादा होगी।जो खुशी बिना कारण अंदर से आती है आपके अस्तित्व से आपके होने से आती है वो खुशी सदा सर्वदा है और कभी जाने वाली नही है! ये बिल्कुल आपके श्वांस के साथ हर पल रहेगी ! इस खुशी की अनुभूति तब होगी जब आपके विचार आपका ध्यान बाहरी वस्तुओ से विचारो से हटेगा, जब आप स्वस्थ होंगे स्वयम् में स्थित होंगें, जब आपके हृदय रूपी सरोवर में विचारो की तरंगे शांत होंगी। संसार की सबसे मूल्यवान चीज है तो खुशी। खुशी है तो जहान है खुशी नहीं तो सब कुछ होते हुए भी बेकार है ।सच्ची खुशी का आधार श्रेष्ठ चिंतन, शुद्ध विचार ,सकारात्मक चिंतन है। सकारात्मक चिंतन का आधार श्रेष्ठ ज्ञान ,ईश्वरीय ज्ञान है ।परमात्मा ने हमें यह बताया कि आप भौतिक शरीर नहीं बल्कि इस भौतिक शरीर को चलाने वाली चैतन्य आत्मा है, जब यह ज्ञान स्वयं को हो जाता है तो जीवन में अविनाशी खुशी स्वत ही बनी रहती है। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रह्माकुमार नारायण भाई ने खुशी का खजाना हमारे पास है विषय पर दीपा की चोकी पर स्तिथ ब्रम्हाकुमारी आश्रम में नगर वासियों को संबोधित करते हुए बताया कि संग्रह से मनुष्य कभी भी मूल्यवान नहीं बन सकता। मनुष्य समाज में मूल्यवान बनता है तो वह सिर्फ अपने त्याग के कारण। भगवान शिव इसलिए नहीं पूजे जाते कि उनके पास स्वर्ण भंडार भरे पड़े हैं अपितु इसलिए पूजे जाते हैं, कि स्वर्ण लंका का दान कर सकने की सामर्थ्य रखने पर भी वो खुले आसमान के नीचे जीवन यापन करते हैं। सेवा केंद्र संचालिका का ब्रहमा कुमारी माधुरी बहन ने बताया
त्याग की महिमा हमें भगवान शिव से सीखनी चाहिए। स्वयं माँ अन्नपूर्णा के स्वामी होने पर भी जो पकवान और मिष्ठान नहीं अपितु फल-फूल व पत्तों का रसपान कर अपना जीवन निर्वहन करते हैं। कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं और कुछ लोग जीते ही खाने के लिए हैं।भगवान शिव का त्याग हमें यह सन्देश देता है कि संग्रह आपको सुख साधन तो उपलब्ध करा देगा मगर शांति अथवा प्रसन्नता कभी भी नहीं दे पायेगा। अतः जीवन में प्रसन्न और समाज में प्रतिष्ठित रहना है, तो खाने के लिए न जीकर जीने के लिए खाना सीख लो।ज़िन्दगी की दौड़ में जो लोग आपको दौड़ कर नही हरा पाते वही आपको तोड़ कर हराने की कोशिश करते हैं। कार्यक्रम में ब्रह्मा कुमारी सेना बहन, डॉक्टर कन्यालाल , मदन परवाल, अरुण गहलोत अनेक सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे।


