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दादा लेखराज का है आज जन्मदिवस

दादा लेखराज  का है आज जन्मदिवस 



15 दिसम्बर ऐसे महापुरुष की जन्म जयंती है, जिन्होंने भागीरथ बन ज्ञान के सागर सर्व शक्तिवान परम पिता परमात्मा को अपना माध्यम बनने दिया। दादा ने ईश्वर के महावाक्यों को मां की तरह अपने अनुभव के आधार पर सहज बनाकर सरल भाषा में हम बच्चों के आगे रखा। माँ का वात्सल्य पिता का प्रोटेक्शन आपमें हम सभी ने पाया। विश्व इतहास के इस पुण्य दिवस पर उन भागीरथ जिन्हें हम सब ब्रह्मा बाबा कहते, हमारा शतशत नमन।


*दादा लेखराज  का*

  *जन्मदिन  15 दिसंबर*


आज 15 दिसम्बर है यह दादा लेखराज जी का जन्म दिन है, जिनके 60 वर्ष पूरे होने पर इनके तन में  शिव परमात्मा ने प्रवेश करके इनका नाम प्रजापिता ब्रह्मा रखा ओर नई दुनिया की स्थापना का कार्य प्रारंभ किया । इनके जीवन की एक पुस्तक उपलब्ध है जिसका नाम है - *"जीवन को पलटाने वाली अद्भुत जीवन कहानी ।"* इसके भाग एक ओर भाग दो... दो पुस्तकें बनीं हुई है इनको हर बीके भाई बहनों को जरूर जरूर पढ़ना चाहिए ।जिस व्यक्ति ने पुरे 84 जन्म लिए ओर अन्तिम 84वां जन्म कैसा रहा यह जानना बहुत जरूरी है । अगला महीना जनवरी माह आ रहा है यह हमारे लिए एक विशेष तपस्या का महीना रहता है ।18 जनवरी को ब्रह्मा बाबा ने अपनी पुरानी देह को त्याग कर सम्पूर्णता को प्राप्त किया था । तो मेरा कहने का मतलब यह है कि हमें  अभी से ही ब्रह्मा बाबा की जीवनी का अध्ययन प्रारम्भ कर देना चाहिए l

और अपने आप को कैसे ब्रह्मा बाबा  यानी बाप समान बनकर अव्यक्त स्थिति को धारण करना है?


*संक्षिप्त कहानी बाबा ब्रह्मा बाबा की*


सन 1880 में एक गांव के विनम्र स्कूल मास्टर के घर में ब्रह्मा बाबा / दादा लेखराज कृपलानी का जन्म हुआ। हिन्दू धर्म के रीति रिवाजों के अनुसार लेखराज का पालन-पोषण हुआ। बहुत छोटी उम्र में अनेकानेक काम करने के बाद उन्होंने हीरे-जवाहरातों का व्यवसाय  कोलकाता शुरू किया, जिसमें उन्होंने एक हीरा विक्रेता के रूप में बाद में बहुत नाम कमाया। पांच बच्चों के पिता ...दादा लेखराज अपने समाज का भी नेतृत्व करते थे। जो अपने सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते थे। सन 1936 में उम्र के उस पड़ाव में जब सामान्यत: सभी लोग सेवा निवृत्ति की तैयारी करते हैं तब उन्होंने वास्तव में अपने जीवन के एक सक्रिय और आकर्षक पड़ाव में प्रवेश किया। गहरी आध्यात्मिक समझ और साक्षात्कारों की श्रृंखला के पश्चात् उन्होंने एक सशक्त आकर्षण को महसूस किया और अपने व्यवसाय को समेट कर अपना समय, शक्ति और धन को इस विद्यालय की स्थापना अर्थ खर्च किया जो बाद में *ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय बना।*


*सन 1937 से 1938 के बीच में उन्होंने 8 युवा बहनों की एक व्यवस्थापकीय कमेटी बनाई और अपनी सर्व चल-अचल सम्पत्ति इस ट्रस्ट को समर्पित कर दी।*


*ऐसे थे यादगार स्वरूप*  *हमारे प्यारे ब्रह्मा बाबा*


          

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