आज का चिंतन(सुविचार) - fastnewsharpal.com
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आज का चिंतन(सुविचार)

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💠 *Aaj_Ka_Vichar*💠

🎋 *..25-12-2020*..🎋


✍🏻जितना डर कोरोना से लग रहा है, यदि उतना डर कर्मो से लगने लगे तो दुनियाँ अपने आप स्वर्ग बन जाएगी।

💐 *Brahma Kumaris* 💐

🌷 *σм ѕнαитι*🌷

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  💥 *विचार परिवर्तन*💥


✍🏻कुछ लोग आपके रास्ते में गड्ढे खोदने का काम करें? तो परेशान मत होना, क्योकि ये वही लोग हैं जिनकी वजह से आप छलांग लगाना सीख जाएँगे।

🌹 *σм ѕнαитι.*🌹


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💧 *_आज का मीठा मोती_*💧
_*25 दिसंबर:-*_ खुशियो से भरा है मन, दिलो में उमंग छाया है, सुनहरे जीवन का उपहार लिए प्यारा सांता आया है..हैप्पी क्रिसमस।
        🙏🙏 *_ओम शान्ति_*🙏🙏
       🌹🌻 *_ब्रह्माकुमारीज़_*🌻🌹
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🙏 *ॐ शांति* 🙏

अगर आप अपने जीवन को आनंदमय बनाना चाहते हैं, तो *साधनों* को छोड़... *साधना* और *संबंधों* को महत्व देना सीखें...

🌸 सुप्रभात... 

💐💐 आपका दिन शुभ हो... 💐💐


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अनमोल वचनः 

सभी हमें पसन्द करें....यह हमारे हाथ में नहीं,पर परमात्मा हमें पसन्द करें...यह हमारे हाथ में है। इसलिये संसार को खुश करने की नहीं... भगवान को खुश करने की कोशिश करो तो जीवन में वह सब कुछ मिल जायेगा,जो संपूर्ण सुख के लिये जरूरी है।

🙏ओम् शांति🙏

💐आपका दिन शुभ हो 💐

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👏🌹😊अनमोल मोती-
जब तक इंसान हमारे साथ होता है, हम जीवन भर उसकी कमी कमजोरी ही निकालते रहते हैं, और एक बार उसके इस जीवन से विदा लेते ही, हमें महसूस होता है, कि कमी कमजोरी के साथ ही सही वो इंसान हमारे साथ ज़रूर रहे, अतः कोशिश लोगों में सदा अच्छाई देखने की ही होनी चाहिये, 
*ओम शांति, सुप्रभात*
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      *❣️कर्मफल का भोग टलता नहीं  🏵️

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_💡एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया । वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था। उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया ।_


_🔅राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी । वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है ।  जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी । राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया ।_


_🔅राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी । उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया ? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी । आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा ।'  प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया ।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है ?"_


_🔅वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था । परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग  ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा ।  उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा ?"  ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा । मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है । इसमें ईश्वर साक्षी हैं।  बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं ।"_


_🔅ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः,  "मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ ।"_


_🔅ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया । इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया । वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ ।_


_🔅किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा । ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषीजी महाराज कहाँ गये हैं ?"  तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा ।"_


_🔅इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया । परंतु ज्योतिषीजी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे । ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ ?"  "आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है ? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है ?"_


_🔅"यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है । दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है । यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है, और यह भोगे बिना कटेगा नहीं ।  *अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभुक्तं क्षीयते कर्म  कल्पकोटिशतेरपि॥* 'अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है । बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता ।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े ।"_


_🔅"महाराज ! आपने क्या कर्म किया था ?"   "सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी, फोड़े में  कीड़े पड़ गये जिन्हें खाने के लिये  मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर खा लेता । इससे जब दर्द के कारण यह कूदती थी आखिर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी । वहाँ भी इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी । इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी । मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली । 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा ।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी । गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना । अब वही मेरी स्त्री हुई । जो कुछ दिनों और अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी, लेकिन मैंने चोंच इसको दर्द पहुंचाने के लिये नहीं मारी थी, अतः इसकी समझ भी ठीक होगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानता क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है । इसलिए मैं शांत रहता हूँ और प्रतिक्षा में हूँ कि कभी तो इसका स्वभाव अच्छा होगा !! अब अपना प्रश्न पूछो ? "_


_🔅ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया ?"  ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है ।"_


_🔅"किस प्रकार ?"   "पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था । वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी । पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गई है ?"_


_🔅आपने जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला । इतने में  जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खा गया ।  कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया । क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया । तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है । इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो ।"_


_*🔅कितना सहज है ज्ञान संयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्म सिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे, बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे !*  

        



      *🌷🔅ओम शान्ति 🔅🌷*


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