ताली बजाने का आध्यात्मिक तथा शारीरिक दोनों महत्व - संत रामबालकदास
ताली बजाने का आध्यात्मिक तथा शारीरिक दोनों महत्व - संत रामबालकदास
थानखम्हरिया
ताली बजाकर हरिनाम लेने से सब पाप तो दूर होते ही हैं यह एक उत्कृष्ट व्यायाम भी है। जैसे पेड़ के नीचे खड़े होकर ताली बजाने से पेड़ पर बैठी सब चिड़िया उड़ जाती हैं वैसे ही ताली बजाकर हरिनाम लेने से देह रूपी वृक्ष से अविद्यारूपी सब चिड़िया उड़ जाती हैं।
पाटेश्वरधाम के आनलाईन सतसंग में पुरूषोत्तम अग्रवाल की जिज्ञासा कीर्तन में ताली के महत्व पर प्रकाश डालते हुये संत रामबालकदासजी ने कहा " राम नाम सुंदर कर तारी। संशय बिहग उड़ावनहारी।। गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस में बताया कि ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में संशय बड़ा बाधक है। कबीरदास जी ने भी कहा है कि जो संशय का खण्डन करेगा वही ज्ञान प्राप्त कर सकेगा। संशय दूर करने का उपाय है निष्ठा तथा विश्वास। यदि माया रूपी नर्तकी से बचना चाहते हैं तो जीवन में कीर्तन का समावेश आवश्यक है। हाथों से संबंधित अनेक क्रियायें हैं जैसे हाथ जोड़ना, हथेलियों को रगड़ना, ताली बजाना, आरती लेना आदि। इन सभी क्रियाओं का अलग - अलग महत्व है। सभी से ऊष्णा पैदा होती है जो ऊर्जा के रूप में मस्तिष्क पर सीधा प्रभाव डालता है। हाथ की ग्रंथियों के घर्षण से मन में सात्विक विचार कौंधते हैं। जन्म लेते ही मनुष्य के हथेलियों की लकीरें बनकर आती हैं लेकिन भगवान के कीर्तन में ताली बजाने से वे रोज बदल जाती हैं। ताली बजाने से तन्मय होने और ध्यान लगाने में भी सुविधा होती है।
ताली बजाना आध्यात्मिक लाभ के साथ शरीर को स्वस्थ रखने का एक अत्यंत उत्कृष्ट साधन भी है। हमारे हाथों में एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स अधिक होते हैं। ताली बजाने के दौरान हथेलियों के एक्यूप्रेशर केन्द्रों पर अच्छा दबाव पड़ता है जिससे अनेक बीमारियों का निवारण हो शरीर निरोगी बनता है। शरीर का आलस्य, निष्क्रियता खत्म होकर क्रियाशीलता बढ़ती है। रक्तसंचार की रूकावट दूर होती है। रक्त का शुद्धिकरण होता है। फेफड़ों की बीमारियाॅ दूर होती हैं। रक्त के श्वेत रक्तकण सक्षम तथा सशक्त बनने के कारण शरीर में चुस्ती, फुर्ती तथा ताजगी का अहसास होता है। महाराज जी ने कहा सुबह जब चिड़िया चहचहाये, योगासन के समय तथा पूजा - कीर्तन में तालबद्ध तरीके से अपनी पूरी शक्ति के साथ ताली बजायें और रोगों को दूर भगायें।
