मनुष्य को दीमक की तरह खा जाता है "अहंकार" - - आचार्य नंदकुमार शर्मा
मनुष्य को दीमक की तरह खा जाता है "अहंकार" - - आचार्य नंदकुमार शर्मा
सुरेन्द्र जैन/धरसीवां
समीपी ग्राम किरना मे जारी भागवत कथा के तीसरे दिन शुक्रवार को भागवत आचार्य पंडित नंदकुमार जी शर्मा, निनवा वाले ने व्यक्ति के अंदर विद्यमान अहंकार के ऊपर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य के अनेकों मित्र एवं शत्रु बनते हैं , परंतु मनुष्य अपने सबसे बड़े शत्रु को पहचान नहीं पाता है | मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहीं बाहर नहीं बल्कि उसके स्वयं के भीतर उत्पन्न होने वाला अहंकार है |
इसी अहंकार के कारण मनुष्य जीवन भर अनेक सुविधाएं होने के बाद भी दुखी ही रहता है | जब मनुष्य के स्वभाव में अहंकार मिश्रित हो जाता है तो वह स्वयं को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट मानने लगता है | अहंकार के मद में चूर होकर के मनुष्य दूसरों के अनुभव एवं ज्ञान का लाभ नहीं ले पाता है क्योंकि दूसरों की संगत में बैठने एवं उनसे कुछ सलाह लेने में मनुष्य का अहंकार बीच में आ जाता है | अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण है! यह मनुष्य को इस प्रकार अपने चक्रव्यूह में फंसाता है कि मनुष्य लाख प्रयत्न करने के बाद भी इस चक्रव्यूह से निकल पाने में सफल नहीं हो पाता है परंतु असंभव कुछ भी नहीं है | अहंकार को कैसे समाप्त किया जाय यह एक यक्ष प्रश्न बनकर सदैव से मनुष्य के समक्ष उपस्थित रहा है | आचार्य शर्मा ने कहा कि अहंकार को समाप्त करने का सबसे सीधा एवं सरल मार्ग है सत्संग का | जब मनुष्य सत्संग में जाने लगता है तो उसे यह ज्ञान होता है कि यह संसार झूठा है और ईश्वर सत्य है! सत्संग रूपी दवा से अहंकार रूपी रोग को दूर किया जा सकता है! आगे उन्होने कहा कि समस्त संसार में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ तो है ही परंतु स्वयं को स्वयं के द्वारा सर्वश्रेष्ठ मानना एवं दूसरों की उपेक्षा करना मनुष्य की सबसे बड़ी कमी है | आज यदि समाज में अहंकार का स्तर बढ़ा है तो उसका सीधा सा एक कारण है कि आज के लोगों ने अपने बुजुर्गों के पास बैठना और सत्संग करना बंद कर दिया है क्योंकि उन्हें ऐसा करने में अपना अपमान लगता है. आज मनुष्य इतना अभिमानी हो गया है कि उसे सत्संग में जाना बहुत छोटा कार्य लगता है | आज सत्संग सभाओं का सूनापन इसका ज्वलंत उदाहरण है | अहंकार को मानस रोग भी कहा गया है और मानस रोगों की औषधि क्षमा , दया , करुणा , प्रेम धैर्य , नम्रता आदि को कहा गया है परंतु अहंकारी व्यक्ति इन औषधियों का सेवन नहीं कर पाता जिससे उसका मानसिक रोग बढ़ता ही जाता है | अपनी भूल को यदि मनुष्य हृदय से स्वीकार करता जाय को वह इस रोग से बच सकता है! आचार्य शर्मा ने कहा कि जब हम विनम्रता की थाली में , क्षमा की आरती , प्रेम का घी , दृढ़ विश्वास का नैवेद्य भगवान को समर्पित करते हैं तब प्रायश्चित की आरती जलने पर इसकी लौ में "मैं" रुपी अहंकार का राक्षस जलकर भस्म हो जाता है | आगे आचार्य जी गजेंद्र मोक्ष, समुन्द्र मंथन, वामन अवतार आदि कथाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किए जिसे सुनकर सभी श्रद्धालु भक्त रोमांचित हो उठे.!

