*राष्ट्र के निर्माण में शिक्षक की अहम भूमिका*
शिक्षक दिवस विशेष--भारतीय शिक्षक आंतरिक शक्तियों से संपन्न होने के कारण भारत को आध्यात्मिक गुरु का दर्जा प्राप्त था--ब्रह्मा कुमार नारायण भाई
*राष्ट्र के निर्माण में शिक्षक की अहम भूमिका*
गोबरा नवापारा नगर
अपने अंदर की क्वालिटी को बाहर निकालना, ना कि बाहर की इंफॉर्मेशन को अंदर डालना।
सारे विश्व के प्रति वसुधैव कुटुंबकम की भावना जागृत करना, आपस में स्नेह प्यार बढ़ाना ,ना कि मरने और मारने की भावना पैदा करना।
*आदर्श शिक्षक* वह जो आचरण से शिक्षा दें।
डॉ राधाकृष्णन* के शब्दों में
विद्यालयों का मुख्य काम डिग्री या डिप्लोमा बांटना नहीं है, बल्कि छात्रों में एडवांस लर्निंग की भावना पैदा करना है ,छात्रों को जीवन मैं आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करना है। एक आदर्श शिक्षक वही होता है जो बच्चों के अंदर छिपे हुए अनेक गुण रत्न, शक्तियों के भंडार को बाहर निकाल जीवन में आने वाली चुनौतियों का सहजता से सामना करा सके व अपनी छिपी प्रतिभाओं की पहचान करा सके ।आज विद्यालय में बच्चों को टैलेंट, प्रतिभाशाली तो बनाया जा रहा है उसके लिए अनेक कोर्सेज ,पाठ्यक्रम ,नवीन टेक्नोलॉजी का ज्ञान तो कराया जा रहा है लेकिन मानव को देवता बनाना, कमजोर को शक्तिशाली बनाना, आने वाली भावी चुनौतियों का सामना कर शक्तिशाली बनाना ,विवेक वान बनाना, सुसंस्कारित बनाने पर ध्यान नहीं देने से वर्तमान समाज, राष्ट्र के सामने अनेक कठिनाइयां ,चुनौतियां सामने खड़ी है।
यह विचार इंदौर से पधारे धार्मिक प्रभाग के जोनल कोऑर्डिनेटर ब्रहमा कुमार नारायण भाई ने शिक्षक दिवस के उपलक्ष में त्रिमूर्ति भवन, ओम शांति कालोनी में शिक्षक सम्मान समारोह में बोलते हुए बताया। जगन्नाथ साहू सहायक जिला शिक्षा अधिकारी ने मुख्य अतिथि के रुप में संबोधित करते हुए बताया शिक्षक ही राष्ट्र का आधार स्तंभ होता है जहां भावी राष्ट्र निर्माण की नीव छात्रों के कोमल, पवित्र ,चेतन अंतर्मन पर विचारों की छाप डाली जाती है। जैसा शिक्षक उसकी शिक्षा संस्कार होते हैं वैसा ही भावी वट वृक्ष तैयार होता है। संतोष साहू राज्यपाल पुरुस्कार से सम्मानित ने अपने माननीय अतिथि के रुप में बोलते हुए बताया कि भारत ही एक ऐसा राष्ट्र रहा है जहां के शिक्षक चरित्रवान होने के कारण भारतीय शिक्षा सारे विश्व में उच्च स्तर पर पहुंच सकी। जिसके कारण नालंदा, तक्षशिला विश्वविद्यालय में देश विदेश के विद्यार्थी शिक्षा लेने भारत आया करते थे। भाई चंद्रशेखर मिश्रा जी विकास खंड अधिकारी ने बोलते हुए बताया कि अब समय आ गया है भारतीय प्राचीन देवी संस्कृति को पुनः जागरुक करने का । जहां गुण ,संपत्ति ,विवेक विद्या के अपार भंडार भरे होने के कारण 33 करोड़ देवी देवताओं में राधा कृष्ण राम सीता जैसे दिव्य आत्मा ने सत शिक्षक परमात्मा शिव की शिक्षा को धारण करके इतनी ऊंचाइयों को प्राप्त किया था। भाई रोशन लाल साहू जिला क्रीड़ा अधिकारी ने बताया कि चाणक्य, वशिष्ठ ,द्रोणाचार्य जैसे गुरुओं ने सारे राष्ट्र की जनमानस से सम्मान प्राप्त किया था। आज उनके पद चिन्हों पर चलने वाले रविंद्र नाथ टैगोर, डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण जैसे शिक्षकों ने राष्ट्र का नाम चारों ओर उजागर किया था, इसीलिए भारत सारे विश्व का आध्यात्मिक गुरु इन प्रतिभाशाली, आंतरिक शक्तियों से संपन्न शिक्षकों, गुरुओं के कारण कहलाता था। सेवा केंद्र संचालिका ब्रह्मा कुमारी पुष्पा बहन ने बताया कि शिक्षक से बडा कोई वरदान नहीं शिक्षक का आशीर्वाद मिले इससे बड़ा कोई सम्मान नहीं। अगले जन्म में वैज्ञानिक नहीं बनना चाहते थे आइंस्टीन*
आइंस्टीन ने कहा -ना जाने मैंने कितने वैज्ञानिक तथ्यों की खोज की ,पर मैं उस तत्व पर नहीं सोच पाया जो इन सब वैज्ञानिक तथ्यों का खोजकर्ता था उस आविष्कारक को ही नहीं खोज पाया।
और अब मैं जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर खाली ही जा रहा हूँ।
अगले जन्म में मैं आत्मदर्शी आत्मअन्वेंषक संत बनूं ,यह मेरी इच्छा है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि मुख्यमंत्री अवॉर्ड से सुशोभित रोशन लाल साहू, रिटायर्ड जिला शिक्षा अधिकारी, जगन्नाथ साहू ,सहायक संचालक शिक्षा विभाग ,नीलकंठ साहू ,हेमंत ,विवेक शर्मा, विशाऊ साहू ,रमा ठाकुर ,पार्वती सोनी, जितेंदर देवांगन , अजय ,महेंद्र इत्यादि शिक्षक गण के साथ अनेक शिक्षक गण मौजूद थे ।सभी शिक्षकगणों का ब्रह्मा कुमारी संस्थान की ओर से मोमेंटो, भारत राष्ट्र को श्रेष्ठ बनाने के लिए कलम प्रदान की गई। कार्यक्रम के आरम्भ में सर्वप्रथम डॉ राधा कृष्ण सर्वपल्ली के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। सभी शिक्षक गणों का स्वागत ब्रह्मा कुमारी आरती ने स्वागत नृत्य के द्वारा किया। कार्यक्रम का संचालन ब्रहमा कुमारी प्रिया बहन ने संस्था का परिचय बताते हुए व कार्यक्रम के पश्चात सभी का आभार पर्दशन करते हुए कहा कि
आइंस्टीन के कमरे में *आइज़क न्यूटन* और *जैक्स मैक्सवेल* इन्हीं दो वैज्ञानिकों की पोट्रेट लगी रहती थी, लेकिन अपने सामने दुनिया में तरह-तरह की भयानक *हिंसक त्रासदी* देखने के बाद उन दोनों तस्वीर को हटा दिया ,और उनके स्थान पर दो नई तस्वीरें लगाई एक महान मानवतावादी *अल्बर्ट श्वाइटजर* और दूसरी महात्मा गांधी* की। और इन चित्रों को स्पष्ट करते हुए ,आइंस्टीन ने कहा, अब समय आ गया है कि हम सफलता की तस्वीर की जगह सेवा की तस्वीर लगा दें।मुझे अंतिम समय में इस बात का खेद है ,और रहेगा, कि वैज्ञानिक होते हुए भी मैं ,क्या-क्या खोजने में लगा रहा, लेकिन *स्वयं की खोज* की तरफ मेरा ध्यान क्यों नहीं गया?हमने उपरोक्त सभी महान व्यक्तित्व के अनुभव पढ़े - शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर ऊपर दिए गए सब अनुभवों एवं महान वैज्ञानिकों के विचारों को पढ़ने के बाद आइए आज हम निश्चित करें कि भौतिक जगत के ज्ञान के साथ-साथ हम अपने आंतरिक जगत को भी खोजने का प्रयास करें आतंरिक अन्वेषक बनें।




