ढेलवानी-छत्तीसगढ़ी लेख - fastnewsharpal.com
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ढेलवानी-छत्तीसगढ़ी लेख

ढेलवानी.          



मया के  मोटरी  हा अइसे आय के जतका भर ले कमती रही ,अउ कोनो येमा आंच आगे ते कइसे सिराही पता घलो नी चले ।तेखरे सेती येला संभाल के रखना बड़ कठिन फेर जरुरी घलो होथे।दुसर के उभरौनी म लोगन काय नी करे ।फेर करम के फर तो मिलबे करथे,चाहे सुग्घर हो....चाहे...?

बिसाहू अउ चैतू  के चेहरा ह मिलती जुलती रिहिस ,तेकरे सेती गांव के सियान समारु ह बिसाहू अउ चैतू ल मितान बदे बर कथे ।सियान के बात ला मान के दूनो झन मितान बद डारथे अउ जिनगी भर एक दूसर के सुख-दुख म संग दे बर किरिया खाथे।मितानी के नता हमर छत्तीसगढ़ म तइहा ले चले आवत परंपरा आय।मितानी ये धरती का,स्वर्ग तक नइ छुटय।दूनों झन के दाई -ददा नी रिहिस । चैतू के बिहाव होगे रिहिस। दूनो परानी अब्बड़ मेहनती रिहिन ।बिसाहू ह घर के सात एकड़ खेत ला बोय अउ अपन मितान ला बनी कमाय बर बलाय।चैतू घर दस काठा के खेत रिहिस । ओतकी ल बोय के बाद उड़त बूड़त मितान के खेत ल कमाय।गांव म दूनो झन के मया ल देख के दूसर मन मितानी के सीख लेवयं।चैतू ह बड़ सुघ्घर गीत गाए ,तेला गांव के लइका मन धियान देके सुने ।वोहा ददरिया गीत संग अपन ददा के सिखोय जड़ी-बुटी के दवई देबर घलो जानत राहय ।गांव म कोनो ल बिच्छी मार दे त चैतू ल बलाय ।चैतू ह बिच्छू  के जहर ल उतारे म बड़ हुसियार  रहाय ।इही म गांव के कतको झन के जिनगी ल बचाय घलो हावे।

एक दिन चैतू ह अपन मितान बिसाहू ल कथे -"कस मितान तैंहा बिहाव कब करबे?

तोला ए बछर बिहाव करना जरुरी हे"।मितान के बात ल सुनके बिसाहू कथे -"ले मितान ते कथस त ए बछर बिहाव करहूं"।

चैतू कथे -" मितान त काली ले देखे -खोजे बर जाबो"।

अब बिसाहू एक झन सुघ्घर  असन  ल मन कर डरिस ।

अब एक दिन बिसाहू ह चुपचाप अपन बियारा म बइठे कुछु सोचत रहाय ।येती चैतू ह अपन मितान ल खोजत-खोजत  बियारा म आथे,चैतू अपन मितान ल अड़बड़ मया करे ,एको कन आँखी ले ओझल हो जाय त ओखर दसा पानी ले निकाले मछरी बरोबर हो जाय।अतका मया।

ते कइसे चुपचाप बइठे हस मितान? चैतू ह पूछथे।

तब बिसाहू कथे-" मैंहा गुनत हो कि मोर बिहाव म जम्मों देखरेख ल कोन करही?

चैतू ह कथे -"मैं तो हावौ न मितान ,मेंहा देखरेख करहूं।

तेहा गुने ल छोड़ अउ बिहाव के तियारी कर"। 

चैतू सगा नेवते ल जाथे ।मड़वा गड़ियाथे अउ बजार जा के साग -भाजी लाथे,गांव भर ल खवाथे।बिहाव ह बने ढंग ले निपट जथे ।

दिन बितत गिस ,बिसाहू एक दिन धान बेचे बर शहर गिस अउ अपन गोसइंन सुकोरा ल चेता दे रिहिस कि मोर मितान ल खाय के बेरा म भात दे देबे।

                    चैत�.  


  चैतू खेत ले लहुटिस त सुकारो ह अइसने सुक्खा रोटी ल दे देथे।चैतू मने मन सोचथे कि बहू मोला कइसे सुक्खा रोटी भर ल दे दिस! फेर बिचारा का करे ,बनिहार हरव कहिके चुपचाप खाके उठगे।सांझ कुन बिसाहू आथे अउ मितान ल कथे -बहू ह बने खाय बर दिस नही गा...त कथे, हौ मितान बने खाय बर दिस ।

अब एक दिन बिसाहू के गोसइंन कथे-"कोनों ह अपन बनिहार ल रोजी संग खाय पीए ल देवत होही...ते ह तो भलवंता बने हस।तुमन बहुत सिधवा हरव तेखरे सेती अइसने होवत हे।काकरो घर तो अइसन नी होवय।अब खाए पीए ल दे बर बंद करहूं "।

"चुपे र न वो चुपे र,मितान सुनहि ते अलकरहा हो जहि"।

"सुनहि त सुनन दे ओला डर्रावत हन का "

।बिसाहू जान डारिस ,सुकारो दुसर के उभरौनी म  आ गे किहि के ।ऐती मितान ह दुनो झन के गोठबात ल सुन परिस ।हृदय ल बान मारे कस लागिस।ओ  दिन ले चैतू ह अपन मितान घर खाय ल छोड़ दिस।बिसाहू अब्बड़ खाय बर मनाय फेर, वोखर मितान ह मानबे नी करे।

एक दिन उही गांव के समारु ह चैतू कर आथे अउ कथे-मोर लइका के तबियत खराब हावे ओला असपताल लेगना हे अउ पइसा के जरुरत हे ,तेखरे सेती अपन खेत ल बेचहूं ।तोर खेत ले मोर खेत लगे हे त तेहां राख लेते त तोर बर बने हो जतिस।

बात ल सुनके चैतू गुने लागिस अउ कहिथे- "मोर कर तो पइसा नइ हे,मोर मितान ल पुछके बताहूं ,हो सके त वोहा रख सकत हे"।

चैतू ह अपन मितान ल बतइस त बिसाहू ह खेत ल ले डरिस।खेत ह लेवागे कहिके सुकारो अब्बड़ खुस हो जथे लेवाय खेत ल देखे बर तको चल दिस।

एक दिन  बनिहार धर के  सुकारो   ढेलवानी रचे बर चल दिस।सबो माटी  ल चैतू के मेड़ के खाल्हे रचवाय ।चैतू ह एक दिन ढेलवानी देखे बर  गिस त देखथे सरी ढेलवानी ह मोर खेत म रचवाय हे।  फेर मितान ह कुछ नी बोलिस।।अइसने मेड़ छोलत तीन बछर बीतगे।   


  एक बेर अब मेड़ रचाय बर सुकारो जात रहाय त चैतू खेत डहान ले आवत रिहिस हे।

ओतकी म सुकारो ल |बिच्छी मार देथे।चैतू ह दउड़त आथे अउ दवई ल खवाथे,अउ डाक्टर ल बला के घलो देखाथे।

सुकारो के आंखी अब खुलथे अउ कथे-मैंहा तुंहर संग कभु नियावं नी करेंव,तभो ले तुमन मोर जीव ल बचाय म कोनो कमी नी करेव ।तुमन नी रतेव त मेंहा बांचतेव के मरतेव कोन जनी बाबू ।मोला समझ म आगे कि काकरो बिगाड़ कभु नी करना चाहि ,मनखे ह नीहिते उपर वाले के नजर सबे कोती होथे ,अउ में  दुष्टिन तोरे खेत ल खावत रेहेंव।अइसे कहात सुकारो गोहार पारके रोवत चैतू ले माफी मांगथे।ओखर आँखी ले निकलत निर्मल गंगा,जमुना कस धार म मन के मैल धोआ जथे।


भोलाराम सिन्हा  गुरुजी

ग्राम डाभा,पो० करेली छोटी

वि०ख० मगरलोड जिला धमतरी 




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