*दादी जानकी की स्मृति दिवस पर विशेषांक*
*दादी जानकी की स्मृति दिवस पर विशेषांक*
दादी जानकी (जिन्हे जनक के नाम से भी जाना जाता हैं) प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की तीसरी मुख्य प्रशासक रही (सितम्बर २००७ से मार्च २०२१ तक)। दादी जानकी जी को विश्व में एक बड़ी हस्ती के रूप में देखा व माना जाता है। उनको ब्राह्मण परिवार में सभी सम्मान की दृष्टि से देखते है। दादी की जीवन कहानी सचमुच अनोखी व प्रेरणादायी रही। इस जीवनी में आप जानेंगे जानकी दादी का इतिहास, वो ज्ञान में कब और कैसे आयी, और 1970 में उनके द्वारा कैसे भारत के बाहर सेवाएं शरू हुई, व कैसे 2007 से 2020 तक दादी ने मुख्य प्रसाशिका के रूप में यज्ञ संभाला।
दादी का परिचय
दादी का जन्म 1916 में उत्तरी भारतीय प्रांत के सिंध सहर में हुआ, जो अब पाकिस्तान में आता है। अपने शुरुआती दिनों से अन्य लोगों के कल्याण का भाव उनके जीवन को प्रेरित करता रहा। अन्य लोगों के कल्याण की भावना उनके जीवन को बल देती थी। जानकी दादी के इस सहज गुण ने उन्हें सबसे अलग व परमात्म-प्यारा बनाया। बापदादा दादी जानकी को स्नेह से जनक पुकारा करते थे। अपने पिताजी के घोडेगाडी पर यात्रा कर लोगो को शाकाहारी भोजन का लाभ बताना, और बीमार व बुजुर्गो की सेवा करना, आदि दादी जानकी के बचपन की यादों में शामिल हैं। उन्होंने ३ वर्ष तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त की और फिर उन्होंने सत्य और परमात्म खोज़ के लिए कई धार्मिक स्थानों की यात्रा शरू की। दादी जानकी यज्ञ के आरंभ में (1937 में) परमात्मा व परमात्म यज्ञ (कर्तव्य) पर सम्पूर्ण निश्चय रख २१ वर्ष की आयु में यज्ञ में सम्मिलित हुए। दादीजी अन्य लोगों की तुलना में 1 साल देरी से आई, इसलिए उन्होंने तुरंत अपना जीवन इसमें समर्पित कर दिया और मुरली को दिन में 5 से 6 बार पढ़ना शुरू किया।
ॐ मण्डली के साथ यात्रा
दादी १८० लोगों के संगठन मे शामिल हुई जो कराची (पाकिस्तान) में एक नया आध्यात्मिक अर्थपूर्ण जीवन जीने आये थे। इस संगठन ने अपना समय गहन आध्यात्मिक पुरुषार्थ में समर्पित किया। मैडिटेशन में आत्मिक चेतना के अन्वेषण ने वास्तविक व अविनाशी पहचान की गहन अनुभूति का भान कराया जो सभी आत्मिक प्राप्ति का स्रोत है। स्व परिवर्तन के लिए परमात्म याद के अभ्यास की विधि द्वारा कुशलता प्राप्त की गई। यह सब १९३९ और १९५० के बीच हुआ। दादी को वर्ष १९५० मे शहरों के आसपास सेवा के निमित्त भेजा गया । दादी जी हमेशा बापदादा के श्रीमत के अनुसार चलती रही।
२००४ में, उन्हें दुनिया के लिए मानवतावादी सेवाओं के लिए जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वारा अल इस्तिकलाल (स्वतंत्रता का पदक) के पहले आदेश के ग्रैंड कॉर्डन से सम्मानित किया गया। २०१५ में, तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी ने दादी को 'स्वच्छ भारत अभियान' का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया। दादी ने हमेशा याद दिलाया "मैं कौन ,मेरा कौन ?" । उपराम रहने वाली दादी जानकी ने २७ मार्च , २०२० में भौतिक शरीर का त्याग कर अव्यक्त बापदादा की गोद ली।
“जनक बेफिक्र बादशाह ,चिंतामुक्त योगी और अपने पिता के संग मे खेलती और रहती है और माता के समान पालना देती हैं“
- *अव्यक्त बापदादा*
