बेघर होना अच्छा है-जैन आचार्य श्री विद्यासागरजी
बेघर होना अच्छा है-जैन आचार्य श्री विद्यासागरजी
सुरेन्द्र जैन /धरसीवा( रायपुर)
डोंगरगढ़ चन्द्रगिरि तीर्थ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागरजी महामुनिराज ने रविवार को अपने अनमोल वचनों में कहा कि बेघर होना अच्छा है।
आचार्य श्री ने कहा कि प्रतिदिन कि भांति भंवर अपनी यात्रा प्रारंभ करता है | हवा के साथ – साथ आगे बढ़ता जाता है | एक बहुत बड़ा तालाब दिखाई देता है जिसमे बहुत सारे कमल खिले हैं और सारा वातावरण सुगन्धित हो रहा है | भंवर सोचता है यहाँ शाम तक रुकने पर भी पेट नहीं भरेगा पर तृप्ति अवश्य मिलेगी | वह संगीत के साथ कमल कि ओर जाता है जो सभी को अच्छा लगता है | वह कमल के ऊपर बैठ जाता है और रस लेना प्रारंभ कर देता है| वह रस लेने में ऐसा खो गया, मन कि ऐसी लगन लग गई सुबह से शाम हो गई | रवि पूर्व से पश्चिम में आ गया | वह भ्रमर भ्रमित हो जाता है | फिर उसको कोई नहीं हटा सकता | यदि वह प्रतिदिन कि भांति स्वतंत्र विचरण करता हुआ घर लौट जाता | जहाँ गए वहीँ पर घर बन गया | बेघर हो गया | घर बहुत छोटा है रहने के लिये | मन को अच्छा लगता है तो नींद अच्छी आती है और मस्तिष्क का भार उतर जाता है | सोने अनेक प्रकार के होते हैं | आचार्य कुंद – कुंद ने कहा तुम निश्चय में सोते जाओ – सोते जाओ सोना नहीं छोड़ना किन्तु व्यवहार में जाग जाओगे तो जागते रहो एक प्रकार से जगाते रहो | जो व्यवहार में सो जाता है वह निश्चय में जाग जाता है | यदि आप आनंद चाहते हो तो व्यवहार में सो जाओ और निश्चय में जाग जाओ | वह भ्रमर ऐसा नहीं कर पाया वह उसी में रस लेने में सुबह से शाम तक लीन रहा और शाम को वहाँ हाथियों का झुण्ड आया और सभी कमल को उखाड़कर सीधा मुह में डाल लिया | अब भ्रमर यहाँ से बाहर आना चाहता है | दिन अस्त होते ही जब रवि भी विश्राम लेता है तो आप लोगो को भी थोडा विश्राम (रात्रि में नहीं खाना चाहिये) लेना चाहिये | जो दादा बन गए हैं उन्हें तो थोडा समझना चाहिये | दादा को बेटे से ज्यादा नाती कि चिंता/ख्याल (लाड) रहती है | तो फिर पिताजी को हमारे पास भेज दो, आप लोग समझ रहे हैं ना | भ्रमर भ्रमित हुआ और मृत्यु को प्राप्त हुआ | जब तक इन्द्रियों कि सम्पदा है तब तक यह सब दीख रहा है जब इन्द्रियों कि सम्पदा समाप्त हो जाएगी तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता | कुछ भी अच्छा नहीं लगना अच्छा है | अभी यदि अच्छा लग रहा है तो अच्छा नहीं है | स्वर्ग कि व्यवस्था उन्ही के लिये है जो माला फेरना, जाप करना प्रारंभ कर दिये हैं | बाकि जैसे आये थे जिस रास्ते से आये थे वहीँ से वापस जाना होगा | जो अब दादा बन गये हैं वे अपने को अब घर में मेहमान समझें वैसे भी दादा को बहुत कम पूछते हैं क्योंकि अब उनके पास है ही क्या जो उन्हें पूछे | हमने कहीं सुना या पढ़ा था कि ज्यादा अच्छा बोलना, ज्यादा मीठा बोलना अच्छा नहीं है क्योंकि वह एक प्रकार से अनेक प्रकार का अर्थ देता है | आप लोग अपना संसार बढ़ाते ही जा रहे हो और कहते हो कि महाराज जी आशीर्वाद दो कि घर बड़ा बने | हम कहते हैं कि घर साथ लेके जाओगे क्या | बेघर होना यही अच्छा है | बेघर जो होता है उसे कोई भी तंग नहीं करता है | इसलिए आप लोग तंगिया जाते हो, इसलिए बेघर होना अच्छा है | बेघर होना मतलब शमशान कि ओर यात्रा करना | वहाँ पर बहुत अच्छा लगता है वहाँ जाओगे तो आपके सभी मित्र दोस्त आपको वहाँ मिलेंगे | वहाँ से आपको कोई नहीं भगाएगा | सभी जगह से लोग यहाँ आ रहे हैं और कहते हैं कि महाराज हमारे यहाँ – हमारे यहाँ चलो | देखते हैं | आज घर वाले भी बेघर वालों के साथ आ रहे हैं | आज आचार्य श्री को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी मीना दीदी, अर्चना दीदी पथरिया निवासी परिवार को प्राप्त हुआ
