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आँखें लाल,मन भी तर, इसमे दोषी कौन- जैनाचार्य विद्यासागरजी

 आँखें लाल,मन भी तर, इसमे दोषी कौन- जैनाचार्य विद्यासागरजी



सुरेन्द्र जैन /धरसींवा 

 गुरुवार को अपने अनमोल वचनों में जैनाचार्य संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागरजी महामुनिराज ने अपने अनमोल वचनों में कहा  कि आज एक रहस्य आपको बताते हैं  

  आचार्यश्री ने कहा आँखे लाल, मन भी तर, इसमें दोषी कौन  जब मनुष्य के भीतर के परिणाम किसी कारण वश कलुषित हो जाते हैं तो मन क्रोधित हो जाता है और आँखे भी लाल हो जाती है | यह इसलिए होता है क्योंकि हमारी दृष्टि दुसरे के दोषों को देखने में लगी रहती है जबकि उस समय हमारे परिणाम बिगड़ रहे होते हैं | हमें पहले अपने अन्दर के भाव परिणाम को देखना चाहिये कि वो किस ओर जा रहे हैं लेकिन हमारी दृष्टि हमेशा दूसरों कि गलतियों कि ओर ही रहती है | यदि हम अपनी दृष्टि अपनी ओर रखें तो हमारा मन साफ़ हो जायेगा और आँखें भी सफ़ेद हो जाएगी | जब आप आईना देखते हो तो क्या देखते हो आईना देखते हो या खुद को देखते हो | आपको एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हैं कि एक छोटा सा बच्चा जब माँ कि गोद में होता है तो वह भी अपनी माँ कि आँखों को देखता रहता है जब उसकी माँ कि आँख लाल होती है (जब माँ क्रोधित होती है ) तो वह बच्चा भी उस समय दूध पीने से मना कर देता है | यह सब हमारी लेश्याओं के परिणाम स्वरुप होता है | जब हमारी शुक्ल लेश्या होती है तो हमारे परिणाम भद्र (स्वच्छ) होते हैं और जब हमारी कृष्ण लेश्या होती है तो हमारे परिणाम ख़राब (कलुषित) रहते हैं | यह रहस्य हमारे गुरु महाराज ने हमको बताया है | जब द्वारका जल रही थी तो वहाँ के राजा एक रिद्धिधारी मुनि महाराज के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं कि हमें और सारी नगरी को इस भीषण अग्नि से बचाइये | तो उस समय वह रिद्धिधारी मुनि महाराज उस राजा से कहते हैं कि इस अग्नि से सिर्फ दो व्यक्ति ही बचेंगे बाकी शेष अग्नि में जल जायेंगे | तो वहाँ के राजा सोचते हैं कि जब दो ही शेष बचेंगे तो क्यों ना माता – पिता को बचाया जाये तो वह अपने माता – पिता को द्वारका से बहार निकालने का प्रयास करते हैं परन्तु जैसे ही वह माता – पिता किले के पास पहुचते है तो वहाँ का दरवाजा जलते – जलते उनपर गिर जाता है और वे वही अग्नि में जल जाते हैं उनका दाहसंस्कार भी नहीं हो पाता | आखिर में सिर्फ कृष्ण और बलराम ही शेष बचते हैं | आज आप लोग चौषठ रिद्धि मन्त्र को शांति धारा आदि में उच्चारण करते हैं किन्तु वह रिद्धि आपको प्राप्त नहीं होती है | रिद्धियाँ दिगम्बर मुनिमहाराज के इर्द – गिर्द घूमते रहती है  लेकिन वे उसका उपयोग अपने लिये कभी नहीं करते हैं | यह रिद्धियाँ मोक्ष्मार्गी को प्राप्त होती हैं मोहमार्गियों को प्राप्त नहीं होती है | यह मोक्षमार्ग है मोहमार्ग नहीं है | इतना सब कुछ होने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसा कर्म करेंगे वैसा फल भोगना निश्चित है | आप लोग बहुत समझदार हैं जिस किसी कि भी मृत्यु होती है तो आप लोग उनके नाम के सामने स्वर्गीय लिख देते हैं और भावना भातें है कि मृत आत्मा को सदगति (स्वर्ग ) प्राप्त हो जबकि ऐसा होता नहीं है सब आपके कर्म पर निर्भर करता है कि आप स्वर्ग, नरक, तृयंच, मनुष्य किस गति को जायेंगे | भगवान से यही प्रार्थना है कि आप लोग इस रहस्य को समझेंगे और अपने भाव परिणाम को भद्र (स्वच्छ) रखेंगे जिससे आपका मन शांत रहे और धर्म कर्म में भी मन लगा रहे | आज आचार्य श्री को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी रचना दीदी, मोनिका दीदी परिवार को प्राप्त हुआ जिसके लिए चंद्रगिरी ट्रस्ट के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन,सुभाष चन्द जैन, चंद्रकांत जैन, सिंघई निखिल जैन (ट्रस्टी),निशांत जैन  (सोनू), प्रतिभास्थली के अध्यक्ष श्री प्रकाश जैन (पप्पू भैया), श्री सप्रेम जैन (संयुक्त मंत्री) ने बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें दी| श्री दिगम्बर जैन चंद्रगिरी अतिशय तीर्थ क्षेत्र के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन ने बताया की क्षेत्र में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी की विशेष कृपा एवं आशीर्वाद से अतिशय तीर्थ क्षेत्र चंद्रगिरी मंदिर निर्माण का कार्य तीव्र गति से चल रहा है और यहाँ प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ में कक्षा चौथी से बारहवीं तक CBSE पाठ्यक्रम में विद्यालय संचालित है और इस वर्ष से कक्षा एक से पांचवी तक डे स्कूल भी संचालित हो चुका है | यहाँ गौशाला का भी संचालन किया जा रहा है जिसका शुद्ध और सात्विक दूध और घी भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहता है | यहाँ हथकरघा का संचालन भी वृहद रूप से किया जा रहा है जिससे जरुरत मंद लोगो को रोजगार मिल रहा है और यहाँ बनने वाले वस्त्रों की डिमांड दिन ब दिन बढती जा रही है | यहाँ वस्त्रों को पूर्ण रूप से अहिंसक पद्धति से बनाया जाता है जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से उपयोग कर्त्ता को बहुत लाभ होता है|आचर्य श्री के दर्शन के लिए दूर – दूर से उनके भक्त आ रहे है उनके रुकने, भोजन आदि की व्यवस्था की जा रही है | कृपया आने के पूर्व इसकी जानकारी कार्यालय में देवे जिससे सभी भक्तो के लिए सभी प्रकार की व्यवस्था कराइ जा सके |उक्त जानकारी चंद्रगिरी डोंगरगढ़ के ट्रस्टी सिंघई निशांत जैन (निशु) ने दी है |

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