मन के हारे हार है, मन के जीते जीत - आचार्यश्री विद्यासागरजी. - fastnewsharpal.com
फास्ट न्यूज हर पल समाचार पत्र,

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत - आचार्यश्री विद्यासागरजी.

 मन के हारे हार है, मन के जीते जीत - आचार्यश्री विद्यासागरजी.



सुरेन्द्र जैन /धरसींवा 

 डोंगरगढ़ चन्द्रगिरि तीर्थ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागरजी महामुनिराज ने अपने अनमोल वचनों में कहा कि मन के हारे हार है मन के जीते जीत

   आचार्यश्री ने आगे कहा कि एक व्यक्ति ज्वर (बुखार) से ग्रषित रहता है उसे ये भी ज्ञात नहीं कि वह कब से ग्रषित है, उसे यह बीमारी कहाँ से लगी, क्यों लगी उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है वह तेज ज्वर के कारण बार – बार बेहोश सा हो जाता है | उसने अभी तक कोई दवाई – ईलाज कुछ नहीं करवाया था | प्रतिकार के बाद भी ऐसी सेवा आदि करना होती है कि यह बुखार कि पुनः पुर्नावृति न हो क्योंकि जब बुखार दोबारा आता है तो उसे गंभीरता से लेना पड़ता है |  एक  व्यक्ति  ने उसे कुछ लेप लगाया और कहा कि कम्बल ओड़कर कुछ समय सो जाओ ध्यान रखना कि बाहर कि हवा अन्दर नहीं जाना चाहिये | उसने उस व्यक्ति के अनुसार किया तो कुछ देर में ही वह पसीना – पसीना हो गया और उसका बुखार भी कुछ कम सा हो गया | बल कम होने पर भी कम्बल से काम चल जाता है | इसी प्रकार हमें भी मोक्षमार्ग में संयम एवं धैर्य रुपी कम्बल को ऐसे ओड़ना चाहिये कि बाहर कि हवा बिलकुल भी अन्दर ना आ सके | न्ह्रर्य्स्त आत्म तत्व को भय नहीं लगता | गलती से कर्म बंध हो भी जाये तो उससे बचने का उपाय है हमारे पास | आपको प्रतिदिन कोई ना कोई नुस्का यहाँ से मिल रहा है अवश्य ही उसका फायदा आपको मिल रहा है | इसे आप दूसरों को भी बताओ और उन्हें कहो कि वो इसे औरों को भी बताये ताकि सभी को इसका लाभ मिल सके | धर्म प्रभावना के लिये कहा भी गया है कि “परस्परो ग्रहोजीवानाम”, जीव मात्र के प्रति हमें करुणा भाव रखना चाहिये यदि कोई कष्ट में है तो हमें उसकी हर संभव सहायता करनी चाहिये जिससे उसका कष्ट दूर हो सके | हमें स्वयं कि और दूसरों कि सहायता करनी चाहिये जिससे हमारा स्वयं का भला तो होगा ही साथ ही दूसरों का भला भी हो जायेगा | आचार्यों ने ये नहीं कहा जी सिर्फ जैनियों का भला करों उन्होंने कहा कि हर मनुष्य का हर जीव का भला करो उसकी हर संभव सहायता करो | जो व्यक्ति कर्म सिद्धांत कि व्यवस्था को समझ लेता है उसे फिर कभी किसी भी परिस्थिति में भय नहीं लगता | जो कर्म आत्मा में पूर्व में लग गए हैं उन्हें भोगना पड़ेगा और जो आज कर्म बंध हो रहा है वह भी जब उदय में आएगा तो उसे भी भोगना पड़ेगा | जो इस रहस्य को जानता है वह कितनी भी कठिन परिस्थिति आ जाये वह अडिग रहता है और अपने कर्म फल को संयम और धैर्य के साथ सहन करता है | कर्म बंध आपके भाव के ऊपर निर्भर करता है कि आपको पुण्य बंध हो रहा है या पाप बंध हो रहा है | इसमें उम्र का कोई बंधन नहीं है | मोक्ष मार्ग में संकल्प सुरक्षित रहना चाहिये | इसलिए कहते हैं कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत | आज आचार्य श्री को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी रोहिता दीदी खुरई निवासी परिवार को प्राप्त हुआ

Previous article
Next article

Articles Ads

Articles Ads 1

Articles Ads 2

Advertisement Ads