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आज का सुविचार

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💠 *Aaj_Ka_Vichar*💠

🎋 *..17-11-2020*..🎋


✍🏻झुठे इन्सान कि ऊंची आवाज सच्चे इन्सान को खामोश करा देती है। लेकिन सच्चे इन्सान की खामोशी झुठे इन्सान की बुनियाद हिला देती है।

💐 *Brahma Kumaris* 💐

🌷 *σм ѕнαитι*🌷


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  💥 *विचार परिवर्तन*💥

✍🏻भलाई करना कर्तव्य नहीं आनंद है, क्योंकि वह तुम्हारे स्वास्थ्य और सुख की वृद्धी करता है। इसलिए सबका भला कीजिए और अपने ईश्वर से सबके भले की कामना कीजिए।
🌹 *σм ѕнαитι.*
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     🧑🏻 भैया दूज का वास्तविक अर्थ 👩🏻

अमावस्या की काली, अंधियारी रात को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है और जिस दिन चंद्रमा के दर्शन होते हैं उस दिन भारत मे सर्वत्र भैया दूज या यम द्वितीया का पर्व मनाया जाता है। रक्षा बंधन के पर्व की तरह ही यह भी बहन -भाई के निश्छल प्रेम का प्रतीक है। पर्व से संबंधित कथा:इस पर्व के संबंध मेँ एक कथा प्रचलित हैं। कहते हैं, यमुना और यम दोनों बहन - भाई थे। यमुना की शादी मृत्युलोक मेँ हो गयी और वह धरती पर बहने लगी। यम को यमपुरी में आत्माओं के कर्मों के हिसाब-किताब देखने और कर्मों अनुसार फल देने की सेवा मिली। यमुना अपने भाई यम को याद करती रहती थी और अपने घर आने का निमंत्रण देती रहती थी। यमराज बहुत व्यस्त रहते थे,  रोज़ ही आत्माओं का लेखा-जोखा करना होता था, इसलिए आने की बात को टालते रहते थे। बार-बार बुलावा भेजते-भेजते आखिर एक दिन भाई आने को वचनबद्ध हो गया, वह कार्तिक शुक्ल का ही दिन था। भाई को घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। बड़े प्यार से, शुद्धिपूर्वक भोजन करवाया और बहुत आतिथ्य किया। बहन के निश्चल स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने वर मांगने को कहा। यमुना ने कहा,  मैं सब रीति भरपूर हूँ, मुझे कोई कामना नहीं है। यम ने कहा, बिना कुछ दिये मैं जाना नहीं चाहता। बहन ने कहा, हर वर्ष इस दिन आप मेरे घर आकर भोजन करें। मेरी तरह जो भी बहन अपने भाई को स्नेह से बुलाए, स्नेह से सत्कार करे, उसे आप सजाओं से मुक्त करें। यमराज ने ‘तथास्तु’ कहा और यमुना को वस्त्राभूषण देकर वापस लौट गए।

👌🏼इस कहानी का बहुत सुंदर आध्यात्मिक रहस्य है। हमने भक्ति मार्ग में भगवान को कहा, 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव,       त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव' भावार्थ यह है कि भगवान पिता तो माना ही,  सखा और भाई भी माना। एक समय था जब हम आत्माएँ और बंधु रूप परमात्मा - इकट्ठे एक ही घर परमधाम में रहते थे. बाद में हम आत्मायेँ पृथ्वी पर पार्ट बजाने आ गईं और यमुना नदी की भांति, जन्म-पुनर्जन्म में, एक स्थान से दूसरे स्थान पर बहती रहीं। परमात्मा पिता का ही दूसरा नाम यमराज भी है। यम का अर्थ है कि वे आत्माओं के कर्मों का हिसाब करते हैं और दूसरा अर्थ है, नियम – संयम का ज्ञान देते हैं। दोनों ही कर्तव्य परमात्मा के हैं। आधा कल्प के बाद द्वापर युग से हम आत्मायेँ अपने पिता परमात्मा को सभी रूपों मेँ,  भाई रूप मेँ भी याद करती आई है और पृथ्वीलोक में आ पधारने का निमंत्रण देती आई हैं। इस संबंध में एक सुंदर भजन भी है, 'छोड़ भी दे आकाश सिंहासन     इस धरती पर आजा रे'। परंतु वो समय भक्तिकाल का होता है,  परमात्मा पिता के धरती पर अवतरण का नहीं। फिर भी वे हमारी पुकार भरी अर्जियों को सुनते रहते हैं,  दिल मेँ समाते रहते हैं और कलियुग के अंत मे जब पाप की अति हो जाती है तब वे साधारण मानवीय तन का आधार ले अवतरित हो जाते हैं । आधा कल्प की पुकार का फल - परमात्म अवरतरण के रूप में पाकर हम आत्माएँ धन्य हो जाती हैं। हम आत्माएँ धरती पर अवतरित बंधु रूप परमात्मा को दिल में समाकर, स्नेह से भोग लगाती है, उसका दिल व जान से आतिथ्य करती हैं। भगवान हमारे इस स्नेह को देख हमें वरदानों से भरपूर कर देते हैं और कहते हैं, जो आत्माएँ धरती पर अवतरित मुझ परमात्मा को पहचान कर सत्कारपूर्वक आतिथ्य करेंगी, मेरी श्रीमत पर चलेंगी, उन्हें मैं सज़ाओं से मुक्त कर दूंगा। इस प्रकार यह त्योहार, परमात्मा के साथ बंधु का नाता जोड़ने और निभाने का यादगार है। परमात्मा तो निराकार हैं, साकार शरीर उनका है नहीं, इसलिए कालांतर में बहन शरीरधारी आत्माओं ने भाई शरीरधारी आत्माओं को तिलक लगाने और मुख मीठा करने के रूप में इसे मनाना प्रारम्भ कर दिया। भगवान के बच्चे हम सब आपस में  बहन-भाई हैं। भाई दूज का त्योहार इस निर्मल नाते को सुदृढ़ करने का आधार है। यह पर्व दीपावली के तुरंत बाद आता है, इसका भी रहस्य है। दीपावली, श्री लक्ष्मी, श्री नारायण के राजतिलक का यादगार पर्व है । इनके राजतिलक के बाद विश्व में, ऐसे भाईचारे का राज्य स्थापित होता है जिसमें नर नारी तो क्या-  गायशेर तक भी इकट्ठे जल पीएंगे - यह मान लीजिये कि गाय और शेर मेँ भी बहन - भाई का निर्मल नाता स्थापित हो जाएगा भावार्थ यही है, पशु, प्राणी, प्रकृति सभी स्नेहपूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे। परमात्मा पिता से भ्रातृ नाता जुड़ाने वाले,  सतयुगी भ्रातृभाव की झलक दिखाने वाले इस भैयादूज के पर्व पर हमारी शुभकामना है कि धरती पर अवतरित धर्मराज भगवान को पहचान कर, उनकी श्रीमत पर चलते हुए आप सभी प्रकार की सज़ाओं से मुक्त हो जाएँ।

💓 से ओम शान्ति 🌹

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भैयादूज और भाईबीज का आध्यात्मिक रहस्य
 
भाई , आत्मा को संबोधित करता हुआ सम्बन्ध सूचक पवित्र शब्द है । भाई आत्मा को कहा जाता है । परम पिता परमात्मा की संतान है हम आत्माएं। शरीर है वृक्ष और आत्मा है बीज।देह में रहते आत्मा बीज रूप स्थिति में स्थित हो   परम पिता   परम आत्मा   जो सर्वश्रेष्ठ है  उसकी याद में रहे  वह है सच्ची सच्ची भैया दूज । हम सभी आत्माओं एक ही भाई है परम आत्मा शिव । दूज अर्थात द्विज ।द्विज ब्राम्हण को कहा जाता है क्योकि उसका दो बार जन्म होता है । इस देह को जन्म देने वाले हमारे लौकिक माता पिता हैं , और इस देह में रहने वाली मै आत्मा परम पिता परमात्मा की संतान हूँ यह निश्चय करने वाला व्यक्ति का द्वितीय जन्म     है  
 " ब्राम्हण जन्म " ।  वह ' द्विज '  कहलाता है ।राजस्व अश्वमेघ अविनाशी रूद्रगीता ज्ञानयज्ञ द्वारा नया जीवन प्राप्त कर लेता है जो बडे भाग्य की बात है ।
कहा गया है -  
" बड़े भाग मानुस तन पावा " । 
परन्तु यह  तन भाग्यवान तब बने जो अपने मन को  ईश्वरीय यज्ञ में  लगाये अपना सब कुछ सफल करे।                                              

💓 से ओम शान्ति 🌹

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💧 *_आज का मीठा मोती_*💧
_*17 नवंबर:-*_ हर गुणों को पहले स्वयं में धारण कर अनुभव करे, फिर उसे सभी को अनुभव कराये यही सबसे बड़ी सेवा है।
        🙏🙏 *_ओम शान्ति_*🙏🙏
       🌹🌻 *_ब्रह्माकुमारीज़_*🌻🌹
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        *🙏🏼★• भगवान बचाएगा ! •★🙏🏼*


_★ 👉एक समय की बात है किसी गाँव में एक साधु रहता था, वह  भगवान का बहुत बड़ा भक्त था और निरंतर एक पेड़ के नीचे बैठ कर।  तपस्या किया करता था | उसका भागवान पर अटूट विश्वास। था और गाँव वाले भी उसकी इज्ज़त करते थे|_


_★ एक बार गाँव में बहुत भीषण  बाढ़ आ गई | चारो तरफ पानी ही  पानी दिखाई देने लगा, सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊँचे स्थानों की तरफ बढ़ने लगे | जब लोगों ने देखा कि साधु  महाराज अभी भी पेड़ के नीचे बैठे भगवान का नाम जप रहे हैं तो। उन्हें यह जगह छोड़ने की सलाह दी| पर साधु ने कहा-  ” तुम लोग अपनी जान बचाओ मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा!” धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ता गया , और पानी साधु के कमर  तक आ पहुंचा , इतने में वहां से एक नाव गुजरी|  मल्लाह ने कहा- ” हे साधू महाराज आप इस नाव पर सवार हो। जाइए मैं आपको सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दूंगा |”_


_★ “नहीं, मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है , मुझे तो मेरा  भगवान बचाएगा !! “, साधु ने  उत्तर दिया.  नाव वाला चुप-चाप वहां से चला गया.  कुछ देर बाद बाढ़ और प्रचंड हो गयी , साधु ने पेड़ पर चढ़ना उचित  समझा और वहां बैठ कर ईश्वर को याद करने लगा | तभी अचानक उन्हें गड़गडाहत की आवाज़ सुनाई दी, एक  हेलिकोप्टर उनकी  मदद के लिए आ पहुंचा, बचाव दल ने एक रस्सी लटकाई और साधु  को उसे जोर से पकड़ने का आग्रह किया| पर साधु फिर बोला-” मैं इसे नहीं पकडूँगा, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा |”_


_★ उनकी हठ के आगे बचाव दल भी उन्हें लिए बगैर वहां से चला गया | कुछ ही देर में पेड़ बाढ़ की धारा में बह गया और साधु की मृत्यु  हो गयी |_


_★ मरने के बाद साधु महाराज स्वर्ग पहुचे और भगवान से बोले -. ” हे। प्रभु मैंने तुम्हारी पूरी लगन के साथ आराधना की… तपस्या की। पर जब मै पानी में डूब कर मर रहा था तब तुम मुझे बचाने नहीं आये,  ऐसा क्यों प्रभु ? भगवान बोले , ” हे साधु महात्मा  मै तुम्हारी रक्षा करने एक नहीं  बल्कि तीन बार आया , पहला,  ग्रामीणों के रूप में , दूसरा नाव   वाले के रूप में , और तीसरा ,हेलीकाप्टर बचाव दल के रूप में. किन्तु  तुम मेरे इन  अवसरों को पहचान नहीं पाए |”_


_👉मित्रों, इस जीवन में ईश्वर हमें कई अवसर देता है , इन अवसरों की  प्रकृति कुछ ऐसी होती है कि वे किसी की प्रतीक्षा नहीं  करते है , वे एक दौड़ते हुआ घोड़े के सामान होते हैं जो हमारे सामने  से तेजी से गुजरते हैं , यदि हम उन्हें पहचान कर उनका लाभ उठा लेते। है तो वे हमें हमारी मंजिल तक पंहुचा देते है, अन्यथा हमें बाद में  पछताना ही पड़ता है|_



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