आज का चिंतन(सुविचार)
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💠 *Aaj_Ka_Vichar*💠
🎋 *..08-02-2021*..🎋
✍🏻हम हर किसी से कुछ सीखते हैं जो हमारे जीवन से गुजरते है कुछ सबक कष्टदायक हैं, तो कुछ दर्द रहित हैं,लेकिन सभी अनमोल है।
💐 *Brahma Kumaris* 💐
🌷 *σм ѕнαитι*🌷
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💥 *विचार परिवर्तन*💥
✍🏻पावो में यदि जान हो तो, मंजिल हम से दूर नहीं है। आँखों में यदि पहचान हो तो, इंसान हम से दूर नहीं है। दिल में यदि स्थान हो तो, अपने हम से दूर नहीं है। भावना में यदि जान हो तो, भगवान हम से दूर नहीं है।
🌹 *σм ѕнαитι.*
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*★?विज्ञान व अध्यात्म-एक दूसरे के पूरक★*
_★आज का समाज भौतिक सुख-संपन्नता को अत्याधिक महत्व देता है।उसने मानव जीवन के आध्यात्मिक पक्ष,जो कि मानवता के अस्तित्व का मुख्य आधार है,कि बिल्कुल ही उपेक्षा कर दी है।_
_★इस चित्र के नीचे के भाग में मानव मस्तिष्क का परिच्छेद दिखाया गया है।विश्लेषणात्मक एवं युक्ति संगत विचार-धाराएं,सार गर्मित अवधारणाएं,तर्क,गणित तथा वैज्ञानिक अनुसंधान--ये सब मस्तिष्क के बाएं गोलार्ध्द के विकास में सहायक होते है।आध्यात्मिक साधनाएं एवं अनूभुतियां जो कि उतने महत्वपूर्ण है,मानव मस्तिष्क के दाहिने गोलार्ध्द के विकास मे सहायक में सहायक होते है।इन दोनों गोलार्ध्दो के समुचित विकास तथा शांति एवं आनंद की अनुभूति निहित है।_
_★अल्बर्ट आइन्स्टीन ने एक बार कहा था "धर्म के बिना विज्ञान अन्धा है तथा विज्ञान के बिना धर्म लगड़ा है"।अध्यात्म रहित विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विहीन अध्यात्म,दो अन्धे और लगड़े व्यक्तियों के समान है जो एक ही कार्य को अलग-अलग रहकर संपन्न करने का प्रयास करते है।कहने की आवश्यकता नही है कि ऐसी स्थिति में उनका यह प्रयास शायद ही कोई सफलता प्राप्त कर सकें।लोग शायद ठीक ही कहते है कि धर्म(आज के संदर्भ में मिथ्याचार अथवा धार्मिक उन्माद)ही बहुत सारा नाहक खून बहाने के लिए उत्तरदायी रहा है।कुछ लोगों द्वारा विज्ञान का भी आणविक शक्ति के रूप में विनाश एवं विध्वंसकारी कार्यों में प्रयोग किया गया है।परंतु जब विज्ञान और अध्यात्म दोनों संगठित रूप से एक जुट होकर कार्य करते है तो विश्व में खुशी,संपन्नता व सुख-शांति की स्थापना का कार्य त्वरित गति से एवं प्रभावी विधि से पूर्ण किया जा सकता है।इन दोनों के एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करने से प्रगति सुनिश्चित होती है।जिससे विश्व संपूर्णता की ओर अग्रसर होता है।यह चित्र के ऊपर के भाग में दिखाया गया है।_
_★यद्यपि,मनुष्य ने विज्ञान के द्वारा भौतिक रूप से आशातीत प्रगति की है तथा अपने जीवन को विश्रांति पद बनाया है,तथापि विकसित देशों के लोग सच्ची मानसिक शांति एवं संतोष की अनुभूति से अभी बहुत दूर है।इससे स्पष्ट है कि हमारा ध्यान पूर्ण रूप से इस पार्थिव शरीर को सुखी बनाने में लगा हुआ है तथा हम अपने मन की आन्तरिक अपेक्षाओं एवं उसकी अध्यात्मिक आवश्यकताओं को बिल्कुल भूल चुके हैं।अतः भौतिक उन्नति करने के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति भी समान रूप से आवश्यक है।_
_★अस्तु,यदि विज्ञान एवं अध्यात्म,बिना एक-दूसरे का विरोध किये मिलकर कार्य करते है तो निश्चित रूप से इसी भूमण्डल पर यह विश्व अपूर्णता से स्वर्णिम सम्पूर्णता को प्राप्त कर सकता है।_
-----------ओम् शांति------------
_★?विज्ञान एवं अध्यात्म द्वारा प्रकृति(मानव स्वभाव) पर नियंत्रण💥_
_★प्रकृति शब्द की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है--प्रथम,पाँच तत्वों से मिलकर बनी हुई प्रकृति तथा दूसरा,मनुष्य की प्रकृति अर्थात स्वभाव।_
_★इस चित्र में नीचे की ओर दिखाया गया है कि भौतिक उन्नति के लिए विज्ञान ने किस प्रकार प्रकृति के पाँच तत्वों की अन्तर्निहित ऊर्जा को नियंत्रण कर लिया है।विज्ञान प्रकृति के विभिन्न ऊर्जा संसाधनों को अपने नियंत्रण में लेकर खनिज सम्पदा का दोहन कर रहा है।सौर ऊर्जा का भी अनेक प्रकार से उपयोग किया जा रहा है।जल से व सागर की लहरों की ऊर्जा से विद्युत का उत्पादन किया जा रहा है।वायु की शक्ति पवन चक्की के उपयोग में लायी जा रही है।विज्ञान चंद्रमा पर तो मानव को भेजने में सफल हो गया है परंतु क्या वह मनुष्य के हृदय में चंद्रमा की शीतलता तथा सत्य,स्नेह एवं आनंद का संचार करके उसे राहत व शांति प्रदान कर सका है ?_
_★जेट विमानों के आविष्कार से विज्ञान ने स्थानों के बीच दूरियां तो कम कर दी है परंतु क्या मानव हृदय के बीच बढ़ती हुई दूरियों को कम सकने में सफल हो सका है ? इन सबका उत्तर नकारात्मक ही होता है।_
_★आज का विश्व संघर्ष के कारण टूट चुका है और जाति,वर्ण,रंग,भाषा,धर्म एवं राष्ट्रीयता आदि के आधार पर बँट चुका है।मात्र वैज्ञानिक प्रगति मनुष्य के अन्तर्मन की व्यथा को कम करने में सफल नही हो सका है।यह तभी सम्भव हो सकता है जब प्रकृति के पाँच तत्वों को नियंत्रित करने के बजाय मनुष्य की प्रवृत्ति अर्थात उसके स्वभाव को परिवर्तित किया जाय।मनुष्य अपनी पाँचों कर्मेन्दियों का अधिकारी बनकर यह प्राप्ति सहज ही कर सकता है,जैसा कि चित्र के मध्य मे दिखाया गया है।_
_★मनुष्य के कर्मेन्दियों की तुलना रथ में जुते हुए उन घोड़ों से की जा सकी है जिन पर स्वच्छन्दता पूर्वक रथ को इधर-उधर खींचते फिरते है।आज के मनुष्य की भी यही दशा हो गयी है।अपनी कर्मेन्दियों पर उसका कोई अधिकार नहीं रह गया है।इसके फलस्वरूप मनुष्य सही निर्णय लेने में समर्थ नहीं रह गया है जो उसे जीवन में सदा काल की खुशी दे सके।_
_★अध्यात्मिक चिन्तन एवं राजयोग के अभ्यास से इन कर्मेन्दियों पर पूर्ण अधिकार व नियंत्रण किया जा सकता है तथा मानव की प्रकृति(स्वभाव) को दैवी प्रकृति बनाया जा सकता है।इसके द्वारा मानव की अन्तर्निहित स्वाभाविक रचनात्मक क्षमताओं का विकास किया जा सकता है,जिसके आधार पर इस विश्व में पुनः संपूर्णता,सामंजस्य,शांति,सुख-संपन्नता एवं प्रफुल्लता की स्थापना हो सकती है।_
*💡★◆ओम शान्ति◆★💡*
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