आज का सुविचार(चिंतन)
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💥 *विचार परिवर्तन*💥
✍🏻इस तरह मुस्कुराने की आदत डालिये कि परिस्थिति भी आपको परेशान कर - कर के थक जाए, और जाते जाते जिंदगी भी मुस्कुरा कर बोले आप से मिल कर खुशी हुई।
🌹 *σм ѕнαитι.*🌹
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💥 *जरा सोचो*💥
🌻जिस भगवान को पाने के लिए तुम अपना सर्वस्व त्याग करने को तैयार थे,
उसे पाकर तुम इस संसार मे क्या पाना चाहते हो ?
🌹 *ॐ शांति*🌹
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💧 *_आज का मीठा मोती_*💧
_*30 मई:-*_ पाप कर्म करने से विकर्म तो बनते है लेकिन अभिमान वश किया गया पूण्य कर्म भी मुक्ति के मार्ग में बहोत बड़ा बाधक है ।
🙏🙏 *_ओम शान्ति_*🙏🙏
🌹🌻 *_ब्रह्माकुमारीज़_*🌻🌹
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ओम शाति
*एक बार इंसान ने कोयल से कहा*
*"तूं काली ना होती तो*
*कितनी अच्छी होती"*
*सागर से कहा:-*
*"तेरा पानी खारा ना होता तो*
*कितना अच्छा होता"*
*गुलाब से कहा:-*
*"तुझमें काँटे ना होते तो*
*कितना अच्छा होता"*
*तब तीनों एक साथ बोले:-* *"हे इंसान अगर तुझमें दुसरो की कमियाँ देखने की आदत ना होती तो तूं कितना अच्छा होता...*
ॐ शांति
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ओम शान्ति
*शांत मन ही आत्मा की ताकत है, शांत मन में ही ईश्वर विराजते हैं।*
*जब पानी उबलता है तो हम उसमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख सकते हैं शांत पानीमें हम खुदको देख सकते हैं।*ठीक वैसे ही अगर हमारा हृदय शांत रहेगा तो हमारी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को हम देख सकेंगे।*
ॐ शांति
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ओम शांति
मधुर बोलना अच्छी बात है मगर मधुरता के लिए झूठ बोलना कदापि अच्छा नहीं है। दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए बोला गया स्वार्थवश झूठ अपने व दूसरे दोनों के कल्याण में अति बाधक सिद्ध होता है।*
" ब्रुयात सत्यम प्रियम " अर्थात प्रिय अथवा मधुर ही बोलो लेकिन केवल मधुर ही नहीं अपितु सत्य भी बोलो। अपनी प्रकृति को इस तरह बनाओ कि लोगों को तुमसे सत्य कहने में संकोच न करना पड़े और झूठ कहने का साहस भी न हो।
जो लोग मधुर सुनना तो पसंद करते हैं मगर सत्य सुनने का साहस नहीं जुटा पाते वो लोग आत्मोन्नति से भी वंचित रह जाते हैं। अतः मधुर प्रिय ही नहीं सत्यप्रिय भी बनो।
ॐ शांति
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अनमोल वचन:
इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल,जग में रह जाएंँगे प्यारे तेरे बोल !! जब हम यात्रा पर होते हैं और हमें पता होता है कि एक दिन हमें अपने घर वापस लौटना है तो हम किसी से लड़ते झगड़ते नहीं, सबसे मीठे होकर रहते हैं क्योंकि हमें पता होता है कि हमें अब वापस घर लौटना है, लेकिन सुबह शाम फोन कर अपने घर का समाचार जरूर लेते रहते हैं । इसी प्रकार हम भी तो यहांँ भगवान के घर से आए हैं ना और एक दिन तो वापस सचखंड चले ही जाना है तो क्यों ना हम खुद को परदेसी समझकर सबके बीच प्यार से रहे और सुबह शाम भगवान का सिमरन अपने असली घर सचखंड को हर घड़ी याद करते रहें........
🙏ओम् शांति 🙏
🎈आपका दिन शुभ हो🎈
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*💙◆●OM SHANTI●◆💙*
_★ कर्म रूपी कड़ियों से जुड़कर मानव जीवन बनता है । जैसा कर्म वैसा जीवन यह अकाट्य सत्य है । हम जो कुछ करते हैं मानो बीज होते हैं, जो कालांतर में उगकर फल के रूप में हमारे सामने आता है और हमारा भाग्य बन जाता है । करते समय जो कर्म था, लौटते समय वही भाग्य बन जाता है ।_
_● कर्म के तीन स्तर है _ मनसा, वाचा, कर्मणा । मनसा अर्थात् सोचना, वाचा अर्थात् बोलना और कर्मणा अर्थात् शरीर द्वारा कर्म करना ।_
_● मनसा _ हम जिसके प्रति जैसा सोचेंगे, वह व्यक्ति भी हमारे प्रति वैसा भी सोचेगा । कहते हैं विचार भी यात्रा करते हैं । जैसे फोन के नंबर दबाने पर हजारों मील दूर व्यक्ति के फोन में घंटी बज जाती है । यह इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वेवज के माध्यम से होता है । इसी प्रकार, हमारे मन में उठे विचार से हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति के विचार प्रभावित हो सकते हैं । विचार एक सेकण्ड में कहीं से कहीं पहुंचकर अपना प्रभाव डाल सकते हैं । अच्छे विचारों का प्रभाव अच्छा और बुरे विचारों का प्रभाव पूरा होता है । वास्तव में जब हम किसी के बारे में कुछ भी सोचते हैं तो हमारे विचारों के प्रकंपन सूक्ष्म प्रभाव उस व्यक्ति की दिशा में जाकर उसके विचारों को प्रभावित करते हैं जिसका पता उसे भी नहीं पड़ता कि यह प्रभाव कहां से आ रहा है परंतु उसके विचार प्रभावित अवश्य होते हैं ।_
_●भगवान कहते हैं, भावना का फल अवश्य मिलता है । आप सबकी श्रेष्ठ भावना है, स्वार्थ रहित भावना है, रहम की भावना है, कल्याण की भावना है । ऐसी भावना का फल नहीं मिले, यह नहीं हो सकता । जब बीज शक्तिशाली हो तो फल जरूर मिलता है । सिर्फ इस श्रेष्ठ भावना के बीज को सदा स्मृति का पानी देते रहो तो समर्थ फल, प्रत्यक्ष फल के रूप में अवश्य प्राप्त होता ही है । क्वेश्चन नहीं, होगा या नहीं होगा । सदा समर्थ स्मृति का पानी है अर्थात् सर्व आत्माओं के प्रति शुभ भावना है तो विश्व शांति का प्रत्यक्ष फल मिलना ही है ।_
_● वाचा _ हम जो बोलते हैं वह भी कर्म है और उसका फल भी बीज के अनुरूप ही निकलता है । इसीलिए कहा गया है _ शब्द संभल के बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव । एक शब्द बने औषधि और एक शब्द करे घाव ¡¡_
_● मान लीजिए हजारों की सभा में हमने एक शब्द उछाला कि आप सभी बहुत अच्छे हैं, तो हमारे इस एक बीज के हजारों फल बनकर हमारे पास वापस लौटेंगे । सामने बैठे सभी कहेंगे, आप भी बहुत अच्छे हैं । हमारा दिया हुआ ही हमारे पास वापस आ गया । हम जो बोलेंगे, प्रतिध्वनि हो कर वही लौट आएगा । आज हमारे पास जो कुछ है वह हमारा दिया हुआ ही लौटा है, चाहे वह अच्छा है या बुरा है । जैसे हम बाजरे के एक दाने से हजारों दाने पाते हैं, मकई के दाने से भी हजारों दाने पाते हैं, इसी प्रकार, एक नकारात्मक शब्द यह सकारात्मक शब्द बोला तो बिल्कुल वैसे ही हजारों शब्द उग आएंगे ।_
_● कर्मणा _ शरीर और इसकी इंद्रियों द्वारा किए जाने वाले कर्मों को कर्मणा कर्म कहा जाता है । एक राजस्थानी कहानी से इसको अच्छे से समझ सकते हैं । पुराने जमाने की बात है, एक गरीब ठठेरा तीर्थ यात्रा के लिए गया और अपने जीवन भर की कमाई, गांव के ठाकुर के पास रख गया । कई तीर्थों की यात्रा करके वह छह माह बाद लौटा और ठाकुर जी से अपना धन मांगा । ठाकुर जी के देने से मुकर गए । जब इस गरीब ने रोना चिल्लाना शुरू किया तो ठाकुर जी ने अपने आदमियों को बुलाकर इसे धक्के मार कर निकालने का आदेश दे दिया । जब आदमी इसे पकड़ कर ले जाने लगे तो ठाकुर जी की दहलीज पर यह कहते हुए ठठेरे के प्राण निकल गए कि यह धन तो मैं लेकर ही रहूंगा ।_
_● ठाकुर जी ने अंतिम संस्कार करवा दिया और सोचा बला टली । छह मास बाद ठाकुर जी को पोता जन्मा पर जन्म से बीमार । इसके इलाज में पानी की तरह पैसा बहने लगा । बालक जब आठ साल का हुआ तो यह कह कर संसार से विदा हो गया कि ठठेरे के रूप में मैंने जो धन आपको दिया था, वह मैंने अपने शरीर पर लगवा लिया । अब आप पर मेरा कोई कर्ज नहीं बचा इसीलिए मैं जा रहा हूं ।_
_◆ कहानी हमें बता रही है कि धोखे, झूठ, ठगी से प्राप्त धन बीमारी में लगकर समाप्त हो गया है ऐसा धन आंधी की गति से आकर तूफान की गति से चला जाता है । बरकत केवल इमानदारी से किए गए कर्मो से ही होती है ।_
*💎● ओम शान्ति ●💎*
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🌟══• *“जो चाहोगे सो पाओगे”* •══🌟
_⸙ एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था ,“जो चाहोगे सो पाओगे, जो चाहोगे सो पाओगे।”_
_⸙ बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नहीँ देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।_
_⸙ एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसनेँ उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया।_
_⸙ उसने साधु से पूछा -“महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैँ जो चाहता हूँ?”_
_⸙ साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मैँ उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?”_
_⸙ युवक बोला- मेरी एक ही ख्वाहिश है मैँ हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ।_
_⸙ साधू बोला, कोई बात नहीँ मैँ तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे ! और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।_
_⸙ युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, पुत्र, इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलेंटो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।_
_⸙ युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा । और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।_
_⸙ *‘समय’* और *‘धैर्य’* वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।_
*☀️◆ ओम शान्ति ◆☀️*
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