*मित्र से बिछड़ने का दुख लेकिन तपस्या के मार्ग पर चलने की रही अपार खुशी,मित्र के आशीर्वाद से बचपन मे ही ले लिया था मारुति ने ब्रह्मचर्य व्रत* - fastnewsharpal.com
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*मित्र से बिछड़ने का दुख लेकिन तपस्या के मार्ग पर चलने की रही अपार खुशी,मित्र के आशीर्वाद से बचपन मे ही ले लिया था मारुति ने ब्रह्मचर्य व्रत*

बर्तमान युग मे मित्रता की अनूठी मिसाल हैं मारुति,आचार्यश्री विद्यासागर जी के संसारी जीवन के है मित्र,मित्र को वैराग्य पथ पर जाने में की थी मदद*



*मित्र से बिछड़ने का दुख लेकिन तपस्या के मार्ग पर चलने की रही अपार खुशी,मित्र के आशीर्वाद से मित्र मारुति ने भी ले लिया था  ब्रह्मचर्य व्रत*

   सुरेन्द्र जैन/धरसीवां

मित्रता के बहुत उदाहरण देखने सुनने मिलते हैं लेकिन कृष्ण सुदामा जैंसी मित्रता बर्तमान युग मे आचार्यश्री 108 विद्यासागर जी के संसारी जीवन के बचपन के मित्र मारुति की मित्रता आज एक अनूठी मिसाल है।

    एक ऐंसा मित्र जिसने अपने मित्र बालक विद्याधर के सपनों को साकार किया और उनके आचार्य विद्यासागर बनने की राह में मददगार बने। 

 *आचार्यश्री के बचपन के मित्र हैं मारुति*

देश के कर्नाटक प्रांत के बेलगांव जिला अंतर्गत आने वाला पावन पवित्र गांव है सदलगा गांव जो आचार्यश्री विद्यासागर जी की जन्मभूमि है  मारुति अपने बचपन के मिश्र यानी आचार्य विद्यासागर जी से इतने प्रमावित रहे हैं कि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत भी धारण किया हुआ है। मारुति बचपन में बिताये समय को जब कभी आचार्यश्री के दर्शनार्थ आते हैं तो भक्तों की जिज्ञासा शांत करने जरूर बताते हैं ओर अतीत की यादों में खो जाते हैं कुंडलपुर में एक बार जब बाल ब्रह्मचारी मारुति आचार्यश्री के दर्शनार्थ पहुचे तब उन्होंने बताया था की उनके मित्र बर्तमान के वर्धमान आचार्यश्री बचपन से ही दृढ़निश्चयी रहे हैं। उनका घर का नाम विद्याधर था। करीब 20 वर्ष की अवस्था में उनके मन में वैराग्य का भाव जाग उठा था। उनका चित्त शांत और आध्यात्मिकता में लीन था। आचार्यश्री के बचपन के मिश्र मारुति के दिल में विद्याधर की बात घर कर गयी कि वे आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत पालन करें। शुरू में तो मित्र के बिछड़ने का दुख था किंतु जब विद्याधर ने मिथ्या संसार के सच से परिचय कराया तो मारुति की आंखे खुल गयी।

  *वैराग्य पथ पर आगे बढ़ने जाना था अजमेर तब की थी मित्र ने मेहनत कर मदद*

कर्नाटक के सदलगा गांव से वैराग्य पथ पर आगे बढ़ने विद्याधर अजमेर जाना चाहते थे। इसके लिए रुपयों की जरूरत थी लेकिन विद्याधर परिवार जनों से पैसे मांग नही सकते थे क्योकि इससे परिजनों को पता चल जाता तो शायद वह जाने न दें ऐंसी शंका विद्याधर के मन मे रही तब उन्होंने पूरी बात अपने मित्र मारुति को बताई और मारुति ने उन्हें साहस बंधाया मित्र की इच्छा पूरी करने हेतु मारुति ने 1 रुपये प्रतिदिन से मजदूरी कर अपने मित्र विद्याधर को 117 रुपये कमाकर दिए विद्याधर इन्हीं पैसों की मदद से  1966 में चूलगिरि मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने आचार्य देशभूषण जी से ब्रह्मचर्य व्रत लिया।

  *एक ही स्कूल में पढ़ते थे विद्याधर व मारुति*

 विद्याधर ओर उनके मित्र मारुति सदलगा गांव के एक ही स्कूल में पढ़ते थे और 8वी कक्षा तक की पढ़ाई साथ-साथ की। इतना ही नहीं मारुति उनके इतने करीब रहे कि वे अपना सुख-दुख मारुति के साथ ही साझा किया करते थे। उम्र में मारुति आचार्यश्री से 5 वर्ष बड़े हैं किंतु उनका मन आचार्यश्री के चरणों का अनुरागी है 30 जून 1968 को  जब आचार्यश्री विद्यासागर जी को अजमेर में ही आचार्यश्री ज्ञानसागर जी से मुनि दीक्षा हुई इसके बाद उनके मित्र मारुति उनसे मिलने पहुंचे और कहा कि मुझे अकेला छोड़ दिया। अब मैं क्या करूं। इस पर आचार्यश्री ने उन्हें विवाह के झंझट से दूर रहने को कहा और मित्र की बात मानते हुए आज तक मारुति ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे हैं ऐंसी है आचार्यश्री विद्यासागर जी के संसारी जीवन की बचपन की मित्रता जो बर्तमान युग मे एक अनूठी मिसाल है एक सबक है की मित्रता हो तो ऐंसी।

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