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💠 *Aaj_Ka_Vichar*💠
🎋 *..30-08-2021*..🎋
✍🏻धर्म की सबसे सरल व्याख्या, किसी भी आत्मा को हमारी वजह से दुःख ना पहुँचे, यही धर्म है।
💐 *Brahma Kumaris Daily Vichar* 💐
🌷 *σм ѕнαитι*🌷
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💥 *विचार परिवर्तन*💥
✍🏻भरोसा जितना कीमती होता है, धोखा ऊतना ही महंगा हो जाता है। फुल कितना भी सुन्दर हो, तारीफ खुशबु से होती है। इंसान कितना भी बड़ा हो, कद्र उसके गुणो से होती है।
🌹 *Brahma Kumaris Daily Vichar*🌹
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💧 *_आज का मीठा मोती_*💧
_*30 अगस्त:-*_ चन्दन की खुशबु को रेशम का हार, सावन की सुगंध और बारिश की फुवार, राधा की उम्मीद और कन्हैया का प्यार, मुबारक हो आपको जमाष्टमी का त्यौहार।
🙏🙏 *_ओम शान्ति_*🙏🙏
🌹🌻 *_ब्रह्माकुमारीज़_*🌻🌹
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ओम शांति ब्रह्मा मुख द्वारा निराकार शिव भगवानुवाच l ♥
👥हम आत्माओं ने देह रूपी चोला लेकर l 84 जन्मों का पार्ट बजाया , सृष्टि रंगमंच पर l इस अविनाशी नाटक में, परमात्मा पिता है मुख्य एक्टर, डायरेक्टर l 👳🏻♂️
🌝सूरज चांद सितारे लाइट देते हैं इस धरती रुपी स्टेज पर lनाटक के मध्यांतर में, रावण आता है खलनायक बनकर l 🌚
🌎यह 5000 वर्ष का पूरा नाटक, मुख्य रूप से बना है, भारत वासियों पर l वही है इस नाटक के हीरो एक्टर l 🧛🏼♂️
🌖पहले 2500 वर्ष 21 जन्मों तक, स्वर्ग की सीन होती है सृष्टि रंगमंच पर l फिर इस नाटक में रावण आकर सभी को देह अभिमानी बनाकर l 🧑🏿🦲
☄️सभी को चलाता है अपनी उल्टी मत देकर l धीरे धीरे रावण प्रवेश करता है, सभी के अंदर l सभी को नचाता है, बनाकर विकारी बंदर l 🐒
👨🏻🦳फिर सृष्टि रंगमंच के सभी एक्टर, पतित विकारी बनकर, बिगाड़ देते हैं अपने कैरेक्टर l फिर अनेक धर्म के एक्टर, आते रहते हैं, सृष्टि रंगमंच पर l 🧭
🤝🏻पहले पहले प्रभावशाली होते हैं वह एक्टर, फिर वह भी रावण के वश होकर, गिरते जाते हैं पतित बनकर l ☺️
🗣️अभी कलयुग के अंत में धरती पर, सर्व आत्माओं के पिता परमात्मा आकर, प्रजापिता ब्रह्मा के शरीर का आधार लेकर l👥
🇲🇰 हम आत्माओं को अपनी श्रीमत देकर, वह सर्वशक्तिवान बाप, हम आत्माओं में शक्ति भरकर l 💪🏻
🦅सभी के अंदर के रावण को, और इस रावण की दुनिया को जलाकर l 🔥
💥फिर से सतयुगी स्वर्ग स्थापन कर , पावन बनाते हैं वह हमें, देह अभिमान से मुक्त कर l अभी सभी आत्माओं को, देह रूपी वस्त्र उतारकर l 🪱
🛖अपने मीठे बाबा के साथ जाना है, मुक्तिधाम घर l पार्ट बजाने फिर से आएंगे, जब स्वर्ग होगा धरती पर l🌎
🙏 *ॐ शांति* 🙏
फल मिले न मिले... लेकिन अच्छे कर्म न छोड़ें। पिछला बोझ उतरने पर ही वर्तमान का फल प्रत्यक्ष होगा। तभी कहा जाता है " *कर्म* कर... *फल* की इच्छा न कर"।
🌸 सुप्रभात...
💐💐 आपका दिन शुभ हो... 💐💐
🙏 *ॐ शांति* 🙏
किसी बुरे मनुष्य को सुख भोगता हुआ देख *हैरान* न हो, क्योंकि उसका आज का *सुख* उसके पूर्व जन्मों का फल है और आज जो वो कर रहा है वह भी उसको *भोगना* ही पड़ेगा क्योंकि सब कुछ *वापस* आता है, पुण्य और पाप भी... अतः यदि अपना आज और कल सुखमय बनाना है तो दूसरों को न देखें केवल खुद और *खुदा* पर ध्यान दें।
🌸 सुप्रभात...
💐💐 आपका दिन शुभ हो... 💐💐
♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️
*👉🏿गलत आहार का 🏵️गलत प्रभाव*
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"किसी नगर में एक भिखारिन एक गृहस्थी के यहाँ नित्य भीख मांगने जाती थी। गृहिणी नित्य ही उसे एक मुठ्ठी चावल दे दिया करती थी। यह बुढ़िया का दैनिक कार्य था और महीनों से नहीं कई वर्षों से यह कार्य बिना रुकावट के चल रहा था। एक दिन भिखारिन चावलों की भीख खाकर ज्यों ही द्वार से मुड़ी,गली में गृहिणी का ढाई वर्ष का बालक खेलता हुआ दिखाई दिया। बालक के गले में एक सोने की जंजीर थी। बुढ़िया की नीयत बदलते देर न लगी। इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई,गली में कोई और दिखाई नहीं पड़ा। बुढ़िया ने बालक के गले से जंजीर ले ली और चलती बनी।
घर पहुँची,अपनी भीख यथा स्थान रखी और बैठ गई। सोचने लगी,"जंजीर को सुनार के पास ले जाऊंगी और इसे बेचकर पैसे खरे करुँगी।" यह सोचकर जंजीर एक कोने में एक ईंट के नीचे रख दी। भोजन बनाकर और खा पीकर सो गई। प्रातःकाल उठी,शौचादि से निवृत्त हुई तो जंजीर के सम्बन्ध में जो विचार सुनार के पास ले जाकर धन राशि बटोरने का आया था उसमें तुरंत परिवर्तन आ गया। बुढ़िया के मन में बड़ा क्षोभ पैदा हो गया। सोचने लगी-"यह पाप मेरे से क्यों हो गया? क्या मुँह लेकर उस घर पर जाऊंगी?" सोचते-सोचते बुढ़िया ने निर्णय किया कि जंजीर वापिस ले जाकर उस गृहिणी को दे आयेगी। बुढ़िया जंजीर लेकर सीधी वहीं पहुँची। द्वार पर बालक की माँ खड़ी थी। उसके पांवों में गिरकर हाथ जोड़कर बोली-"आप मेरे अन्नदाता हैं। वर्षों से मैं आपके अन्न पर पल रही हूँ। कल मुझसे बड़ा अपराध हो गया,क्षमा करें और बालक की यह जंजीर ले लें।"
जंजीर को हाथ में लेकर गृहिणी ने आश्चर्य से पूछा-"क्या बात है? यह जंजीर तुम्हें कहाँ मिली?" भिखारिन बोली-"यह जंजीर मैंने ही बालक के गले से उतार ली थी लेकिन अब मैं बहुत पछता रही हूँ कि ऐसा पाप मैं क्यों कर बैठी?"
गृहिणी बोली-"नहीं, यह नहीं हो सकता। तुमने जंजीर नहीं निकाली। यह काम किसी और का है,तुम्हारा नहीं। तुम उस चोर को बचाने के लिए यह नाटक कर रही हो।"
"नहीं,बहिन जी,मैं ही चोर हूँ। कल मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी। आज प्रातः मुझे फिर से ज्ञान हुआ और अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए मैंने आपके सामने सच्चाई रखना आवश्यक समझा," भिखारिन ने उत्तर दिया। गृहिणी यह सुनकर अवाक् रह गई।
भिखारिन ने पूछा-"क्षमा करें,क्या आप मुझे बताने की कृपा करेंगी कि कल जो चावल मुझे दिये थे वे कहाँ से मोल लिये गये हैं।"
गृहिणी ने अपने पति से पूछा तो पता लगा कि एक व्यक्ति कहीं से चावल लाया था और अमुक पुल के पास बहुत सस्ते दामों में बेच रहा था। हो सकता है वह चुराकर लाया हो। उन्हीं चोरी के चावलों की भीख दी गई थी।
भिखारिन बोली-"चोरी का अन्न पाकर ही मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी और इसी कारण मैं जंजीर चुराकर ले गई। वह अन्न जब मल के रूप में शरीर से निकल गया और शरीर निर्मल हो गया तब मेरी बुद्धि ठिकाने आई और मेरे मन ने निर्णय किया कि मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। मुझे यह जंजीर वापिस देकर क्षमा माँग लेनी चाहिए।"
गृहिणी तथा उसके पति ने जब भिखारिन के मनोभावों को सुना तो बड़े अचम्भे में पड गये। भिखारिन फिर बोली-"चोरी के अन्न में से एक मुठ्ठी भर चावल पाने से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है तो वह सभी चावल खाकर आपके परिवार की क्या दशा होगी,अतः, फेंक दीजिए उन सभी चावलों को।" गृहिणी ने तुरन्त उन चावलोंको बाहर फेंक दिया।"
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है-प्रयाप्त हे।*
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अनमोल वचनः
जो कल था उसे भूलकर तो देखो,
जो आज हे उसे जी कर तो देखो,
आने वाला पल खुद ही सवर जाएगा,
एक बार ओम साईं राम बोल कर तो देखो
🙏ओम् शांति🙏
🌷आपका दिन शुभ हो 🌷
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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी♦️♦️♦️
*👉 क्रोध-रूपी पिशाच 🏵️ 🔅🔅🔅🔅🔅 🔅🔅🔅🔅🔅
एक बार श्री कृष्ण बलदेव
एवं सात्यकि रात्रि के समय
रास्ता भटक गये !
.
सघन वन था ;न आगे राह
सूझती थी न पीछे लौट
सकते थे !
.
निर्णय हुआ कि घोड़ो को
बांध कर यही रात्रि में
विश्राम किया जाय !
.
तय हुआ कि तीनो बारी-
बारी जाग कर पहरा देंगे !
.
सबसे पहले सात्यकि जागे
बाकी दोनो सो गये !
.
एक पिशाच पेड़ से उतरा
और सात्यकि को मल्ल-
युद्ध के लिए ललकारने
लगा !
.
पिशाच की ललकार सुन
कर सात्यकि अत्यंत क्रोधित
हो गये !
.
दोनो में मल्लयुद्ध होने लगा !
.
जैसे -जैसे पिशाच क्रोध
करता सात्यकि दुगने क्रोध
से लड़ने लगते !
.
सात्यकि जितना अधिक
क्रोध करते उतना ही पिशाच
का आकार बढ़ता जाता !
.
मल्ल-युद्ध में सात्यकि को
बहुत चोटें आईं !
.
एक प्रहर बीत गया अब
बलदेव जागे !
.
सात्यकि ने उन्हें कुछ न
बताया और सो गये !
.
बलदेव को भी पिशाच की
ललकार सुनाई दी !
.
बलदेव क्रोध-पूर्वक पिशाच
से भिड़ गये !
.
लड़ते हुए एक प्रहर बीत
गया उनका भी सात्यकि
जैसा हाल हुआ !
.
अब श्री कृष्ण के जागने
की बारी थी !
.
बलदेव ने भी उन्हें कुछ न
बताया एवं सो गये !
.
श्री कृष्ण के सामने भी
पिशाच की चुनौती आई !
.
पिशाच जितने अधिक क्रोध
में श्री कृष्ण को संबोधित
करता श्री कृष्ण उतने ही
शांत- भाव से मुस्करा देते ;
पिशाच का आकार
घटता जाता !
.
अंत में वह एक कीड़े जितना
रह गया जिसे श्री कृष्ण ने
अपने पटुके के छोर में
बांध लिया !
.
प्रात:काल सात्यकि व बलदेव
ने अपनी दुर्गति की कहानी
श्री कृष्ण को सुनाई तो श्री
कृष्ण ने मुस्करा कर उस
कीड़े को दिखाते हुए कहा -
यही है वह क्रोध- रूपी
पिशाच जितना तुम क्रोध
करते थे इसका आकार
उतना ही बढ़ता जाता था !
.
पर जब मैंने इसके क्रोध का
प्रतिकार क्रोध से न देकर तो
शांत-भाव से दिया तो यह
हतोत्साहित हो कर दुर्बल
और छोटा हो गया !
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*अतः क्रोध पर विजय पाने*
*के लिये संयम से काम ले !*
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