पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा पर पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधा सागर से के अनमोल वचन - fastnewsharpal.com
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पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा पर पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधा सागर से के अनमोल वचन

 पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा पर पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधा सागर से के अनमोल वचन



   सुरेन्द्र जैन/ धरसीवां

 जैन समाज के पर्वाधिराज पर्युषण पर्व जिन्हें दशलक्षण पर्व भी कहा जाता है शुक्रवार दस सितंबर से प्रारंभ हो गए हैं दस धर्मो पर आधरित दशलाक्षण पर्व पर हमें जीवन मे क्या प्रेरणा देते हैं आइए जानने की कोशिश करते हैं पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधा सागर जी के अनमोल वचनों को सुनकर।

  पूज्य मुनिश्री ने अपने अनमोल वचनों में पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के  प्रथम दिवस मंगल प्रवचन में कहा कि

"ओं ह्रीं उत्तम क्षमाधर्माड़्गाय नमः

चन्द्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी

**निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव ज्ञान रथ के सारथी108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा*

*हम दुनिया में किसी को अनुकूल नहीं बनायेंगे,हम दुनिया के अनुकूल बनेंगे*



1.अनुकूल-हम सब मिलकर के वहां जहाँ क्षमा रहती हैं पानी क्यों नहीं बरस रहा गर्मी क्यों लग रही हैं कोई भी वस्तु हमारे अनुकूल नहीं चली तो उसे हमने  छोड़ दिया जो निमित्त हमारे अनुकूल नहीं चल उसे मिटाने का भाव कर लेते हैं बेटा भी चाहता है पिता मेरे अनुकूल चले पत्नी चहती हैं कि पति अनुकूल चले गुरु चाहता शिष्य हम दुनिया में किसी को अनुकूल नहीं बनायेंगे हम दुनिया के अनुकूल बनेंगे।

2.ज्ञायक-ज्ञान और ज्ञेय को गौण कर दिया ज्ञायक को पकड़ो।अंनत गुण है कहा तक पकड़ो इसलिए आधार को पकड़ लो सब हो जायेगा कुछ धर्म ऐसे हैं जिनमें आधार को भी छोड़ दिया गया है क्षमा व्यापक है जो किसी के भी पास जा सकती है पापी के पास जा सकती है धर्मात्माओ के पास भी जा सकतीं हैं जब धर्म दुनिया को साथ होने को तैयार है तो हम भी साथ हो जाते है महान आत्माये जैसा है वैसा ही सोचता है।

3.मन भी वचन भी काय भी गंदगी है फिर भी धर्म चला जाता है सम्मान सम्यक दृष्टि का  है लेकिन धर्म नहीं है जब चारो तरफ से सब कुछ पवित्र हो जाता है तब हम धर्म नहीं धर्मात्मा को नमस्कार कर लेते हैं अंरहत को नमस्कार किया उनके गुणों को नमस्कार हो गया क्योंकि दोनों अभिना भावी है धर्मात्मा को नमस्कार करने से धर्म को नमस्कार हो जायेगा मुझे हीरा चाहिए जोहरी नहीं क्या करना गुणों को नमस्कार गुणी को नमस्कार किया गया है मन भी वचन भी काय भी गंदगी है फिर भी धर्म चला जाता है सम्मान सम्यक दृष्टि  है लेकिन धर्म नहीं है जव चारो तरफ से सब कुछ पवित्र हो जाता है तब हम धर्म नहीं धर्मात्मा को नमस्कार कर लेते हैं अंरहत को नमस्कार किया उनके गुणों को नमस्कार हो गया क्योंकि दोनों अविनाभावी है धर्मात्मा को नमस्कार करने से धर्म को नमस्कार हो जायेगा मुझे हीरा चाहिए जोहरी नहीं क्या करना गुणों को नमस्कार गुणी को नमस्कार किया गया है

4.वंदनीय कोन-जाप के अंदर धर्म को नमस्कार किया गया धर्मात्मा को नमस्कार नहीं कुछ धर्म ऐसे होते हैं जो स्व रुप से वंदनीय होती हैं धर्म रुप होते हैं धर्मात्मा के रूप में वंदनीय होता है उत्तम क्षमा धर्म परमात्मा हो या नहीं हूं वंदनीय कहा है धर्मात्मा के कोटी में नहीं आता लेकिन वंदनीय हैं सम्यक दर्शन वंदनीय हैं सम्यकदृष्टि धर्मात्मा वंदनीय नहीं। धर्मात्मा के बिना धर्म नहीं रह सकता कुछ धर्म ऐसे होते हैं जो स्वत्रंत होते है पांचो कल्याणक की वंदना कराई लेकिन गर्भ धारण करने की पूजा नहीं है ऐसे ही धर्म कारण करने वाले की वंदना नहीं कि गई यदपि  पंचकल्याणक में पाँचोंकल्याणको की पूजा होती हैं

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