पुरानी दुखद बातों को भूलना ही होली मनाना है-- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई* - fastnewsharpal.com
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पुरानी दुखद बातों को भूलना ही होली मनाना है-- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई*

 *अच्छे विचार बुरे आदत को परिवर्तन कर देते हैं--ब्रम्हाकुमारी माधुरी



 पुरानी दुखद बातों को भूलना ही होली मनाना है-- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई*


 अलीराजपुर 

 प्रतिवर्ष फागुन की पूर्णमासी को  होली का त्योहार मनाया जाता है। इसको चार प्रकार से मनाते हैं। एक दूसरे पर रंग डालते हैं। अंतिम दिन होली का जलाते हैं। मंगल मिलन मनाते हैं। कई लोग झूले में कृष्ण की झांकी भी सजाते हैं। इसके पीछे कई आध्यात्मिक रहस्य है। फागुन की पूर्णमासी की रात्रि को होली जलाने का अर्थ पिछले वर्ष की कटू स्मृतियों को जलाना, अपने दुखों को भूलना और हंसते खेलते नए वर्ष का आह्वान करना।



 इसके अतिरिक्त पुरानी वर्ष के अंत में इस त्यौहार को मनाया जाना इस रहस्य का भी परिचय देता है कि यह त्योहार पहले पहले कल्प अर्थात कलयुग के अंत में मनाया गया था ।जिसके बाद सतयुग के सुख शांति के दिन शुरू हुए थे ।कलयुग के अंत में होलिका जलाने से मनुष्य का दुख दरिद्रता और वासना तथा यथा सब दूर हो गए थे। यह विचार इंदौर से पधारे धार्मिक प्रभाग के राष्ट्रीय सयोजक ब्रह्मा कुमार नारायण भाई ने दीपा की चौकी पर स्थित ब्रह्माकुमारी सभागृह में नगर वासियों को होली के पर्व का आध्यात्मिक अर्थ बताते हुए बताया। होली  अर्थात होलका शब्द का अर्थ भुना हुआ अन्न।होलिका के अवसर पर लोग अग्नि में अन्न डालते हैं और गेहूं और जौ कि बालों को भूनते हैं। योगियों की बोलचाल में योग को अग्नि की उपमा दी जाती है क्योंकि जैसे भुना हुआ अन्न आगे उत्पत्ति नहीं कर सकता वैसे ही ज्ञान और योग युक्त अवस्था में किया गया कर्म भी अकर्म हो जाता है। वह इस लोक में विकारी मनुष्यों के संग में फल नहीं देता है। अतः होलका शब्द हमें इस बात की स्मृति दिलाता है कि परम पिता ने पुरानी सदी के अंत में मनुष्यों को ज्ञान योग रूपी अग्नि द्वारा कर्म रूपी बीज को भुनाने कि  जो श्रीमद् दी थी उस पर आचरण करें। कार्यक्रम के अंत में ब्रह्माकुमारी माधुरी बहन ने मन को निर्मल बनाने के लिए बताया हम अपनी किसी भी गलत आदत को बदलने की कोशिश करते रहते हैं, और जब हम विफल रहते हैं, तो निराश हो जाते हैं।परंतु हम यह नहीं जानते कि कोई भी आदत या संस्कार बनता कैसे है....तो हम देखते हैं, कि हमारी हर अच्छी या बुरी आदत या संस्कार का आधार हमारे अच्छे वा बुरे विचारों का ही परिणाम है अतः हमें अपने अच्छे संस्कार या अच्छी आदत बनाने के लिए अपने विचारों को अच्छा बनाने की आवश्यकता है।

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