मजदूर है मजबूर....विशेष
मजदूर है मजबूर....विशेष
मजदूर है मजबूर अब भी निर्धारित से दूर।
शोषण है भारी पेट की खातिर है मजबूर।।
बन गए श्रमिक संगठन खुश हैं जो भरपूर।
मजदूर है मजबूर अब भी निर्धारित से दूर।।
जमी में धंसता जाता देखो शोषित ये मजदूर।।
तुम एक दिना बासी खाओ रोज खाये मजदूर।
दिन रात पसीना बहा रहा न देह पसीना दूर।
मजदूर है मजबूर अब भी निर्धारित से दूर।।
गजब विटामिन बासी में ये जानत है मजदूर।
ताती कभी न खाता वासी खा जाता मजदूर।।
एक दाना व्यर्थ नही सम्मान अन्न भरपूर।
मजदूर है मजबूर अब भी निर्धारित से दूर।।
मजदूर का बेटा पढ़े कहां है सुविधाओ से दूर।
कहाँ इलाज करवाये तुरत इन सुविधाओं से दूर।।
देखो आकर सिलतरा कैंसे मजदूर है मजबूर।
मजदूर है मजबूर अब भी निर्धारित से दूर।।
बन गए धन्नासेठ सब लेबर ठेकेदार।
श्रमिक संगठन कई बने पर हुआ नहीं उद्धार।।
आठ घन्टे इंट्री बारह घन्टे मेहनत भरपूर।
मजदूर है मजबूर अब भी निर्धारित से दूर।।
सुरेन्द्र जैन/ धरसीवा
