वीडियो-- सारागांव में भरी किसानों ने हुंकार,किया चक्काजाम *काला कानून वापस नही तो आन्दोलन वापस नही*
सारागांव में भरी किसानों ने हुंकार,किया चक्काजाम
*काला कानून वापस नही तो आन्दोलन वापस नही*
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सुरेन्द्र जैन/सांकरा-निको धरसीवां
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति और संयुक्त किसान मोर्चा के देशव्यापी आह्वान पर छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन से जुड़े घटक संगठनों के किसानो ने शनिवार को रायपुर बलौदाबाजार मार्ग पर सारागांव में चक्काजाम कर काले कानूनों के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया।
किसानों के द्वारा पूरे प्रदेश में चक्का जाम, धरना और प्रदर्शन किया गया। यह आंदोलन किसान विरोधी कानूनों को वापस लेने, सी-2 लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने का कानून बनाने, देशव्यापी किसान आंदोलन पर दमन बंद करने तथा केंद्र सरकार के किसान विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त बजट के खिलाफ आयोजित किया गया।प्राप्त जानकारी के अनुसार पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति और छत्तीसगढ़ किसान महासंघ के बैनर तले सारागांव में रायपुर बलौदाबाजार मुख्य राजमार्ग को किसानों की भारी संख्या ने जाम कर दिया।
*ये लोग रहे उपस्थित*
इस चक्का जाम आंदोलन में छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष संजय पराते और छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला,घनश्याम वर्मा सचिव पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति, जिला पंचायत अध्यक्ष डोमेश्वरी वर्मा,देवव्रत नायक कमलेश्वर ठाकुर,अंकित वर्मा,अश्वनी वर्मा,ठाकुर राम वर्मा,अंकित वर्मा, नकुल साहू,श्रीमती सरोज वर्मा,रमली साहू,कुंती देवांगन, सुखबति देवांगन,मीना वर्मा,वीरेंद्र वर्मा सुरेश वर्मा,राजू वर्मा,रामदेव साहू,दौलत बघेल,सुरेंद्र वर्मा,मुन्ना नायक, वीरनारायण देवांगन टीकारामसाहू,जगदीश देवांगन,डेलू साहू,अज्जू खान गुणवंत साहू,शेखर यादव,मोहन वर्मा,सहित बड़ी संख्या में क्षेत्र के किसान मौजूद रहे।
चक्का जाम से पहले हुई एक सभा को संबोधित करते हुए आलोक शुक्ला ने किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ दिल्ली में धरनारत किसानों और इस आंदोलन को कवर कर रहे पत्रकारों के दमन की तीखी निंदा की। उन्होंने कहा कि सरकार के किसी भी कानून या फैसले के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन करना इस देश के हर नागरिक का अधिकार है, जिसकी पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने भी की । 26 जनवरी को लाल किले में हुई हिंसा इसी का परिणाम थी, जिसकी आड़ में किसान आंदोलन को बदनाम करने की असफल कोशिश की।
संजय पराते ने कहा कि एक ओर तो सरकार तीन किसान विरोधी कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित करने का प्रस्ताव रख रही है,लेकिन दूसरी ओर अपने बजट प्रस्तावों के जरिये ठीक इन्ही कानूनों को अमल में ला रही है। इस वर्ष के बजट में वर्ष 2019-20 में कृषि क्षेत्र में किये गए वास्तविक खर्च की तुलना में 8% की और खाद्यान्न सब्सिडी में 41% की कटौती की गई है। इसके कारण किसानों को मंडियों और सरकारी सोसाइटियों की तथा गरीब नागरिकों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जो सुरक्षा प्राप्त है, वह कमजोर हो जाएगी। इस बार के बजट में फिर किसानों की आय दुगुनी करने की जुमलेबाजी की गई है। इस बजट के जरिये जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर डकैती डालने की कोशिश की जा रही है, जिस पर किसानों और आदिवासियों का अधिकार है। इससे मोदी सरकार का किसान विरोधी चेहरा उजागर हो गया है।
खौना के कमलेश्वर ठाकुर ने कहा कि देश का किसान इन काले कानूनों की वापसी के लिए खंदक की लड़ाई लड़ रहा है, क्योंकि कृषि क्षेत्र का कारपोरेटीकरण देश की समूची अर्थव्यवस्था, नागरिक अधिकारों और उनकी आजीविका को तबाह करने वाला साबित होगा। उन्होंने कहा कि जब तक ये सरकार किसान विरोधी कानूनों को वापस नहीं लेती, किसानों का देशव्यापी आंदोलन जारी रहेगा। सारागांव के मुख्य मार्ग में हुए आधा घंटे चक्का जाम पूरे तरह से शांति पूर्वक सम्पन्न हुआ इस दौरान बीच रोड पर हाथ मे तख्ती लेकर बैठ गया और केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानून को वापस लेने के लिए नारे लगाया। इस दौरान रोड के दोनों ओर गाड़ी की लंबी लाईन लग गई ।चक्काजाम के दौरान कोई अप्रिय घटना न हो इसके लिए सिलयारी चौकी-खरोरा थाना का स्टाफ मौजूद थे।

