नगर में बने 20 बिस्तरों वाला कोरोना अस्पताल सुविधाहीन,शुरू होते ही बना मौत का कारण
गोबरा नवापारा नगर में दिख रहा नगर प्रशासन की उदासीनता व हो रही नियमो की धज्जियां
नगर में बने 20 बिस्तरों वाला कोरोना अस्पताल सुविधाहीन,शुरू होते ही बना मौत का कारण
देखे वीडियो-
-किस तरह नगर में कोरोना नियमो में ढील ,नगर प्रशासन उदासीन
गोबरा नवापारा नगर
भाजपा नवापारा मंडल अध्यक्ष उमेश यादव ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा रायपुर कलेक्टर द्वारा कोरोना के बढ़ते संक्रमण की चैन को तोड़ने के उद्देश्य से समूचे जिले में 9 अप्रैल से 19 अप्रैल तक लॉकडाउन लागू किया गया था, जिसे वर्तमान स्थिति की समीक्षा उपरांत एक सप्ताह के लिए फिर से बढ़ा दिया गया है ।
नगर में दिख रहा प्रशासन व जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता
. लॉकडाउन के 10 दिन बाद भी नवापारा नगर में कोरोना की स्थिति काफी भयावह है . प्रतिदिन भारी संख्या में मिल रहे संक्रमितों के अलावा नगर में अब तक 10 से भी अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं . आम आदमी तो दूर खुद चिकित्सकों में इस कदर भय व्याप्त है कि कुछ चिकित्सकों ने अपनी क्लिनिक बंद कर दी है तो कुछ ने ओपीडी . नगर की इस स्थिति का मुख्य कारण आम लोगों की लापरवाही के साथ-साथ सक्षम अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की विफलता और गलत निर्णय भी जिम्मेदार हैं . पिछले वर्ष लॉकडाउन के दौरान नगर थाना के प्रभारी क्रमशः राकेश ठाकुर और प्रशिक्षु डीएसपी प्रशांत खांडे थे . इन दोनों की कार्यशैली इस कदर चुस्त और सख्त थी कि लोग इनके भय से ही घरों से बाहर नहीं निकलते थे . बदकिस्मती से अब ये दोनों अधिकारी नगर से स्थानांतरित हो चुके हैं . ऐसा नहीं है कि वर्तमान थाना प्रभारी कृष्णचंद सिदार काबिल नहीं हैं, लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सत्तारूढ़ पार्टी से संबंधित नेताओं द्वारा उन्हें स्वच्छंद रूप से कार्य नहीं करने दिया जा रहा है . यही हाल नायब तहसीलदार, तहसीलदार और एसडीएम का भी दिखाई दे रहा है .
नही रहा रसुबदारो को कोरोना का भय लोग हो रहे संक्रमित
अगर नगर में कोरोना संक्रमण बढ़ने के कारणों पर विचार किया जाय तो पता चलता है कि जिस व्यक्ति के कंधे पर नगर के लोगों की जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर पा रहा है . रायपुर जिले में लॉकडाउन के बाद भी गरियाबंद जिला चालू था . ऐसे समय में नगर के कुछ नागरिक राजिम जाकर अपनी दुकानदारी करते रहे, यह जानते हुए भी राजिम में भी लगातार संक्रमण बढ़ रहा है और ऐसे में वे संक्रमित होते हैं तो नवापारावासियों का अपने-अपने घरों में कैद रहकर कोरोना की चैन तोड़ने का प्रयास करना विफल हो जाएगा . मालूम हुआ कि इस सत्यता को जानते हुए भी, संबंधित सक्षम व्यक्ति ने ही राजिम प्रशासन से चर्चा कर इन चुनिन्दा दुकानदारों को राजिम आने-जाने की छूट दिलवाई थी . सवाल यह है कि अगर 10 दिन ये चुनिन्दा व्यापारी राजिम में व्यापार नहीं करते तो क्या उनके घर खाने के लाले पड़ जाते ?
अस्थि विसर्जन स्थल व नेहरू घाट में नही हो रहा कोरोना सम्बंधित नियमो का पालन लगा रहता भीड़
इस प्रकार मालूम हुआ है कि नगर के नेहरु घाट में प्रदेश के विभिन्न इलाकों से अपने परिजनों के अस्थि विसर्जन के लिए आने वाले लोगों से कोरोना संक्रमण बढ़ने की संभावना को देखते हुए तहसीलदार, थाना प्रभारी और खुद सीएमओ ने रोक लगाने का प्रयास किया . तहसीलदार द्वारा बाकायदा नेहरु घाट में तीन तरफ से बैरीकेडिंग लगवा दी गई और तो और खुद अस्थि विसर्जन करने वाले पंडों ने भी सामूहिक निर्णय लेकर अस्थि विसर्जन न करवाने की घोषणा कर दी . लेकिन अगले दिन सुबह संबंधित व्यक्ति नेहरु घाट जा पहुंचे और एकतरफा निर्णय करते हुए फिर से अस्थि विसर्जन प्रारंभ करवा दिया . संबंधित व्यक्ति की दलील थी कि अस्थि विसर्जन हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण संस्कार है और फिर कोरोना पॉजिटिव मरीजों की शक्लें तक उनके परिजनों को देखने को नहीं दी गई, तो ऐसे में उनके अस्थि विसर्जन को रोकना उनके साथ कुठाराघात होगा . मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाय तो संबंधित व्यक्ति की सोच बिल्कुल सही थी, लेकिन अगर जब पूरे शहर में ही आग लगी हो तो सबसे पहले अपना घर बचाना ही बुद्धिमानी कही जाती है . संबंधित व्यक्ति ने इस बार भी नहीं सोचा कि नगरवासी घर के भीतर कैद रहकर कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना उन तक न पहुंचे, मगर अस्थि विसर्जन करने वाले उनकी इस मेहनत पर पानी फेर सकते हैं . लोगों ने जिम्मेदार लोगों को ऐसे समय में सलाह भी दी कि अगर अस्थि विसर्जन नहीं रोक सकते तो कम से कम अस्थियाँ लेकर आ रहे लोगों की कोरोना जांच करवा ली जाय, जो पॉजिटिव हो उसे वापिस भेज दिया जाय और जो नेगेटिव हो उसे अस्थि विसर्जन करने दिया जाय . इससे अस्थि विसर्जन होने के साथ-साथ लोगों की भावनाएं बनी रहेंगी और नगरवासी भी सुरक्षित रहेंगे . लेकिन इस सलाह को नकार दिया गया . इस पर लोगों ने नगर के वार्ड क्रमांक 04 में स्थित मुक्तिधाम में अस्थि विसर्जन करवाने की सलाह दी गई, जिससे नागरिकों को संक्रमण का खतरा न रहे, लेकिन इसे भी नकार दिया गया . अब लोग सलाह दे रहे हैं कि जिन पंडों और उनके सहयोगियों ने पिछले 10 दिन में अस्थि विसर्जन करवाया है, उनकी ही कोरोना जांच करवाई जाय, जिससे भी कोरोना संक्रमण फैलने में मदद मिल सकती है . लेकिन इस बार भी ऐसा नहीं लगता कि इस पर अमल किया जाएगा . यानि नगर में इस वक्त केवल घर फूंक तमाशा देखने का क्रम चल रहा है . ऐसे में डर है कि आने वाले दिनों में किसी दूसरे की करनी का खामियाजा नागरिकों को भुगतना पड़ सकता है . याद रखना होगा कि आज प्रदेश में सरकारी तो दूर निजी अस्पतालों में भी न तो बेड खाली हैं और न ही वेंटीलेटर . अगर किसी नागरिक की हालत बिगड़ती है तो फिर उसका तो भगवान ही मालिक रहेगा . नागरिकों को अब अपने जीवन की खातिर खुद सोचना होगा कि जो गलत हो रहा है, उसका विरोध करें या फिर मूकदर्शक बनकर अन्य लोगों की तरह अपनी बारी का इन्तजार करते रहें .
नगर में बने 20 बिस्तरों वाला कोविड अस्पताल बना सुविधा हीन,शुरू होते ही लोगो के लिये बने मौत का कारण
सोमवार को नगर के सरकारी अस्पताल में 20 बिस्तर वाला कोविड अस्पताल शुरू कर दिया गया है . लोग इसे लेकर बिना सोचे, विधायक और उनसे जुड़े लोगों का आभार व्यक्त कर रहे हैं . इस सुविधाहीन अस्पताल की हकीकत पहले और आज दूसरे दिन ही खुल गई . कोविड अस्पताल में जिस डॉक्टर की रात में ड्यूटी लगाई गई थी, वह अस्पताल से गायब था . अस्पताल में गैस सिलेंडर थे ही नहीं . रात में बड़ी उम्मीद से ग्राम जौंदी के एक बुजुर्ग को, जिनका ऑक्सीजन लेवल 65 हो गया था, उनके परिजन लेकर इस कोविड अस्पताल आये थे . लेकिन कोई सुविधा नहीं होने के कारण लगभग घंटे भर बाद यहाँ से मेकाहारा ले गए . इसी प्रकार आज मंगलवार दोपहर को ग्राम टीला के एक व्यक्ति को भी उसके परिजन लेकर पहुंचे, लेकिन दुनिया भर की औपचारिकता पूर्ण करते-करते इस सुविधाहीन अस्पताल में ही संबधित व्यक्ति की मौत हो गई . बड़ा सवाल यह है कि जिस सरकारी अस्पताल के 3-4 कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव पाए जा चुके हैं, जिस अस्पताल में स्टाफ की पहले से कमी होने के बाद भी आधा दर्जन स्टाफ को उनके राजनीतिक रसूख के चलते रायपुर में उनके घरों के आसपास अटैच कर दिया गया है, जिस अस्पताल में कोरोना मरीज को देखने वाला अनुभवी डॉक्टर मौजूद नहीं है . जिस डॉक्टर की ड्यूटी लगाईं जाती है, वह गायब रहता है, तो भला कोई क्यों न इसे केवल दिखाने भर का कोविड अस्पताल कहे ? समझ तो यह भी नहीं आता कि कोविड अस्पताल के लिए इस सरकारी अस्पताल का चयन भला क्यों किया गया ? क्या इस बात की सामान्य जानकारी भी लोगों को नहीं है कि एक ही अस्पताल में कोरोना और सामान्य मरीजों के रहने पर कोरोना के मामले बढ़ेंगे ? अगर है तो केवल बजट की अफरा-तफरी करने के लिए इस दिखावे के कोविड अस्पताल की शुरुआत की गई है . सवाल तो कई है, जिसके जवाब मांगे जाएं तो शासन और प्रशासन में मौजूद लोगों के पसीने छूट जाएंगे, लेकिन यहाँ सवाल आखिर पूछेगा कौन ? हर कोई सवाल पूछने के लिए एक-दूसरे का मुंह जो ताकता रहता है ।






