कोरोना...,प्रकृति से छेड़छाड़ का ही दुष्परिणाम है- कमलेश चंद्राकर
कोरोना...,प्रकृति से छेड़छाड़ का ही दुष्परिणाम है- कमलेश चंद्राकर
अभिमन्यु नेताम/ कुरुद
प्रकृति का दोहन करते हाईटेक तरंगे, रासायनिक भोजन, जिंदगी को आसान बनाते बड़े-बड़े मशीन उपकरण, सरल और आधुनिक जरुरतें अब हमारे जिंदगी में बहुत ही ज्यादा उपयोगी बन गयी है फिर भी अपनी दिनचर्या अव्यवस्थित कर हम ऐसे जिए जा रहे है कि 'कोई काम नही फिर भी दिनभर की व्यस्तता'
कहा जा रहा, पुर्व में हुये लॉकडाउन नें इंसान को जीना सीखा दिया था। परिवार में मितव्ययता का भाव, योगआसन, बेवजह की दौड़भाग, जरुरी चीजें खरीदनें, वस्तुओं/रुपयों के सही उपयोग करना इंसान सीख गया था साथ ही प्रकृति(वातावरण) स्वच्छ, शांत और शुद्ध हवा हमें देनें लगी थी। समझो यह जिंदगी जिनें के रास्ते बतानें अथवा हमें "सचेत" करनें आयी हो।
प्रकृति के साथ असमन्वय व्यवहार के परिणाम से इतनी प्रभावी कोरोना से लड़नें अब तक प्राकृतिक काढ़ा, नेचुरल शरीरिक ऊर्जा, गर्मपानी, भाप, योगासन और अंत में ऑक्सीजन ही मददगार बनी है।
इसीलिये मुझे लगता है प्रकृति की सेवा हर एक मनुष्य करे। वृक्ष लगायें, प्राकृतिक खाद और हर्बल चीजें उपयोग में लायें। नदी, झरनों, जंगलों का दोहन बंद हो। चंद रुपयों के लिये पर्यावरण प्रदुषित न किया जाये।
अभी भी चेत जाइये। हमनें लगातार अपनों को खोया है। एक भले मानुष नें कहीं लिखा था: "एक के बाद एक आ रही दुखद खबरों से मन विचलित है। जीवन मे कभी ऐसा भी समय आयेगा किसी ने कल्पना नही की थी। कितना किसी को कोई ढांढ़स बंधाये कितना धैर्य रखा जाये। इतनी बेबसी इतनी लाचारी कभी देखी नही। कहते हैं ईश्वर दयालु है, सब पर दया करो कृपा निधान"
इसी से यह लेख लिखनें को जि चाहा। अब सही मायनें में यह समझ आ रहा है कि "विज्ञान वरदान या अभिशाप" निबंध हमें बार बार रटाया क्यूं जा रहा था।
फिलहाल मास्क सोशल डिस्टेंसिंग और स्वच्छता को अपनायें, टींका लगायें और घर के बड़े-बुजुर्गों का ध्यान रखें। अपनें परिवार के लिये आप ही सब कुछ है अत: अपना भी खयाल रखें। बाकी, प्रकृति न्याय अवश्य करती है।
