संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन - fastnewsharpal.com
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संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन

संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन



प्रतिदिन की भांति संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन आज भी किया गया, एक घण्टे के परिचर्चा में संत श्री ने बताया कि आज से जेष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से एक नया माह शुरू होता है यह माह सबसे बड़ा माह है इसीलिए इसको  जेष्ठ माह कहा जाता है यह सर्वाधिक गर्म महीना है अतः बाबाजी ने इन दिनों में सभी को अपने घरों में रहते हुए रचनात्मक कार्य करने के लिए कुछ अच्छा पढ़ने के लिए लिखने के लिए जैसे कविता लेख के लिए प्रेरित किया अच्छे ग्रंथ पढ़िए, अपने बड़ों के साथ समय बिताएं,माता-पिता गुरुजन के साथ बैठिए अपने कुछ अधूरे काम हो तो उन्हें पूरा करिए, पढ़ाई करिए तो साथ में मनोरंजन भी करिए कुछ रचनात्मक खेल खेलिए व्ययाम को जीवन में अवश्य सम्मिलित करिए यह दिन बड़े होते हैं इसलिए इनमें प्रातकाल उठना बहुत ही लाभदायक होता है प्रातः काल उठकर योगा आदि को अपने जीवन में सम्मिलित करिए

     परीचर्चा को आगे बढ़ाते हुए भक्त गणों के द्वारा जिज्ञासाए भी प्रस्तुत की गई जिसमें रामफ़ल जी बकेला धाम ने जिज्ञासा रखी की,बड़ भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत  बिधी  नाना।। इस चोपाई पर प्रकाश डालने की कृपा हो, बाबा जी ने बताया कि अंगद जी और हनुमान जी अपनी पूर्ण शक्ति और प्रेम के साथ श्री राम जी के सेवा में समर्पित रहे, अंगद जी मंदोदरी पुत्र थे तो हनुमान जी अंजनी पुत्र दोनों शिव अंश है, जब श्री राम जी अयोध्या वापस लौटे तो सभी वानरगणों को अपने अपने राज्य को वापस लौटना पड़ा अंगद जी आंखों में अश्रु लाते हुए हनुमान जी को कहते हैं कि जब जब आप श्री राम के चरण दबाएं तो उन्हें मेरी याद अवश्य दिलाएं, जीससे प्रभु सदैव मुझे याद रखें  इस तरह की अटूट प्रेम भक्ति थी अंगद जी की

            रामेश्वर वर्मा जी भीमपुरी ने जिज्ञासा रखी की 

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना।कबहू न संत करहि तेहि पाना।।सुरसरि मिले सो पावन जैसे।इस अनिसहि अंतरु तैसे।। इस चौपाई पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे गुरुवर, बाबा जी ने बताया कि रामचरितमानस की इन पंक्तियों में अपराध की मात्रा को बताया गया है यदि बहुत अधिक मात्रा की शराब में हम एक चम्मच गंगाजल मिला दिए तो वह गंगाजल नहीं बन जाता, वैसे ही अपने संपूर्ण जीवन में अत्यधिक अपराध कर हम सोचेंगे कि हम थोड़ा सा भक्ति भजन कर लेते हैं तो ऐसा कदापि नहीं कि आप के अपराध से आपको मुक्ति प्राप्त हो जाएगी, अपने जीवन को इतना उच्च बनाइए इतना धैर्य पूर्ण बनाइए सदाचारी बनाइए कि आप कभी क्रोध मद लोभ में पड़कर कुछ अपराध भी करते हैं तो वह आपके सत कर्मों के सामने नगण्य हो, जीवन में धैर्य को सुदृढ़ बनाइए, क्षमा करने के भाव को उच्च रखें, पाप कर्म कम से कम हो ऐसा कर्म करें, यह अपराध आपकी उसी प्रकार होंगे जैसी बहते हुए गंगा में शराब को मिला दिया जाता है तो वह बहते हुए गंगा में गंगा जल ही बन जाता है 

    दूधे लाल साहू  छुरिया ने जिज्ञासा रखि की 

जिमि सरिता सागर महु जाही! 

 जदयपि ताहि कामना नही!! 

तिमि सुख संपत्ति विनही बोलिए! 

धरमसील पहि जाहि सुहाएं!! 

इस पर प्रकाश डालने की कृपा करे,  बाबा जी ने बताया कि जिस धन-संपत्ति संपदा के पीछे हम अपना पूरा जीवन निछावर कर देते हैं दर-दर भटकते हैं यदि हम अपने जीवन को रामचरित में लगाएं धर्म का अनुसरण करें सत्कर्म करें जीवन को संयमित रूप से जिए तो यह सभी धन-संपत्ति संपदा हमारे जीवन में बिना बुलाये उसी प्रकार आ जाएगी जिस प्रकार बिना बुलाए सभी नदियां सागर में जाकर समा जाती हैं  हैं 

      पाठक परदेसी जी बैजलपुर ने जिज्ञासा की,चेत सवेरे बावरे, फिर पाछे पछतायl

          तुमको जाना दूर है, कहें कबीर बुझायll

      संत कबीर की वाणी पर प्रकाश डालने की कृपा हो भगवनl, इन्हें स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि जीवन का सपेरा तभी होता है जब हम  जागते हैं, सोचेंगे कि जब सवेरा होगा तब जागेंगे तो  अपने जीवन का बहुमूल्य समय गवा रहे हैं, हमें अपने हर पल को जीना चाहिए प्रसन्नता पूर्वक जीना चाहिए उसका सदुपयोग करना चाहिए यहां पर इन्हीं भावों को बाबा कबीर ने स्पष्ट किया गया है

          नरेंद्र दास जी राजनांदगांव ने बाल्मीकि जी के चरित्र को स्पष्ट करने की विनती बाबाजी से की, महर्षि  बाल्मीकि के चरित्र पर प्रकाश डालते हुए बाबा जी ने बताया कि, बाल्मीकि जी  रत्नाकर नाम के डकैत हुआ करते थे डकैती डालना लूट करना और लोगों को मारना उनका जीवन था, दस्यु परिवार में रहते हुए उनके पत्नी बच्चे भी डकैत ही थे,  पत्नी धार्मिक  प्रवृत्ति की थी, रत्नाकर डाकू इतना बड़ा डकैत था कि राजाओं ने उसके ऊपर इनाम भी रखा हुआ था,घोर जंगल में रहने के कारण कोई उसे पकड़ ही नहीं पाता था, परंतु कहा जाता है ना जब सौभाग्य का उदय होने वाला होता है तो  तो संतों का सानिध्य प्राप्त होता है  जब बाल्मीकि जी का सौभाग्य का समय आया तो नारद जी उनके घर स्वयं पधारे डाकू रत्नाकर ने नारद जी को देखकर पहले तो उन्हें डरा धमका कर लूटने का प्रयास किया गया तब नारद जी के  द्वारा बाल्मीकि जी को उपदेश प्राप्त हुआ, नारायण प्रभु की भक्ति कितनी महान है  , बाल्मीकि जी  प्रभु की भक्ति और अपराध कर्म के बंटवारे को परखने हेतु पत्नी बच्चों के पास गए और नारद जी की प्रेरणा के अनुसार उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों से पूछा कि  मेरी धन-संपत्ति संपदा में तुम्हारा अधिकार है उन्होंने कहा हां आपकी धन-संपत्ति में हमारा अधिकार है, क्या मेरे किए गए अपराधों में भी तुम्हारा अधिकार है उसकी पत्नी धार्मिक प्रवृत्ति की थी वह सभी बात को समझ गई उन्होंने कहा नहीं आपके किये गए किसी भी अपराध में हमारा कोई हिस्सा नहीं बनता क्योंकि वह अपराध तो आप ने ही किए हैं बाल्मीकि जी दोबारा नारद जी पास लौटे और उनसे  प्रेरणा लेकर श्री राम की भक्ति में लीन हो गए और भक्त रूप में उल्टा ही नाम जप करते हुए मरा मरा कहते हुए घोर तपस्या में लीन हो गए तपस्या कई वर्षों तक चली और उनके पूरे शरीर में दीमक लग गईं जिसे बाल्मिक कहा जाता है और 1 दिन बारिश के कारण बाल्मिक पूरा हट गया और उससे एक तेज पुंज उत्पन्न हुआ जो ऋषि बाल्मीकि हुए

       इस प्रकार आज का ज्ञान पूर्ण ऑनलाइन सत्संग संपन्न हुआ

 जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम

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