ऑनलाइन सत्संग का आयोजन सीता रसोई संचालन ग्रुप में श्री संत राम बालक दास जी के द्वारा - fastnewsharpal.com
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ऑनलाइन सत्संग का आयोजन सीता रसोई संचालन ग्रुप में श्री संत राम बालक दास जी के द्वारा

ऑनलाइन सत्संग का आयोजन सीता रसोई संचालन ग्रुप में श्री संत राम बालक दास जी के द्वारा



ऑनलाइन सत्संग का आयोजन सीता रसोई संचालन ग्रुप में श्री संत राम बालक दास जी के द्वारा 13 महीने से प्रतिदिन किया जा रहा है, जिसमें सभी भक्तगण जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते हैं

            आज की सत्संग परिचर्चा में रोम साहू जी भरदा ने विभीषण जी के चरित्र पर जिज्ञासा कि जिस पर संत श्री ने अपने मधुर वाणी में सभी को अवगत कराते हुए बताया कि विभीषण जी मुख्य रूप से माता कौशल्या एवं दशरथ जी के पुत्र थे उनके जन्म की कथा आती है कि जब रावण को भविष्यवाणी द्वारा यह ज्ञान हुआ कि कौशल्या के गर्भ से श्री राम जो कि उनका काल है का जन्म होने वाला है तो उन्होंने माता कौशल्या का हरण कर लिया, और उसको मत्स्य सुंदरी नाम की राक्षसी के पास रख दिया तब ब्रह्मा जी ने 10 सिर वाले रावण का रूप धरकर कौशल्या जी को मुक्ति दिलाई और देवताओं ने उनका विवाह दशरथ जी के साथ वन क्षेत्र में कराया, कहा जाता है कि दशरथ जी माता कौशल्या के रूप पर इतना अधिक मोहित हुए कि जब उनके फेरे हो रहे थे तो उनके तेज का स्खलन हो गया जिसे एक घड़े में रख दिया गया रावण को जब यह पता चला कि उनका विवाह हो रहा है तो उसे रोकने के लिए वन क्षेत्र में पहुंचा तब तक दशरथ जी और कौशल्या जी का विवाह संपन्न हो चुका था और वह जा चुके थे, रावण उस घड़े में रखे  उस तेज को लेकर वहां से चला गया और ऋषियों के प्रताप से उसी तेज से विभीषण जी का जन्म हुआ और उन का भरण पोषण रावण के छोटे भाई के रूप में किया गया, क्योंकि राम जी को पता था कि विभीषण जी उनके बड़े भ्राता है तो उन्होंने पहले राज्याभिषेक उनका कराए तब अयोध्या में श्री राम जी का राज्याभिषेक हुआ है इस तरह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का चरित्र है 

 रामफल जी ने जिज्ञासा रखी की, गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों कटवाया था इस पर प्रकाश डालने की कृपा हो 

 बाबा जी ने बताया कि एकलव्य एक भील पुत्र था, बहुत ही योग्य शिष्य था उसने गुरु द्रोण के प्रतिमा के समक्ष ही समस्त धनुष विद्या का ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जिसे जानकर गुरु द्रोन ने उसे अर्जुन से बड़ा वीर ना बन जाए इसलिए उसके अंगूठा को गुरुदक्षिणा में मांग लिया, एकलव्य तो महान एवं सभी के लिए उदाहरण शिष्य हुए परंतु गुरु द्रोणाचार्य पर एक कलंक लग गया, वैसे भी गुरु द्रोण ने  गुरुकुल अपनी बदले की भावना से स्थापित किया था यदि वे एकलव्य को अपना शिष्य बना लेते तो पांडवों की शक्ति बढ़ जाती और महाभारत  युद्ध 18 दिन नही 8 दिन में ही समाप्त हो जाता है, आज भी लोग यही गलती करते हैं जो लोग धर्म पर चलते हैं उनको नीचा दिखाते हैं और इसीलिए हमारी अच्छाई कम होती जा रही है पूरा विश्व आज एकलव्य की गुरुभक्ति को प्रणाम करता है, जो आज भी अपनी गुरु भक्ति के लिए अमर है                   

           दूधे लाल जी ने जिज्ञासा रखी की 

नवही नीच के अति दुखदाई 

जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई 

भयदायक खल के प्रिय बानी 

जिमि अकाल के कुसुम भवानी 

इस पर प्रकाश डालने की कृपा करे भगवन,यह  प्रसंग रामचरितमानस में तब आता है जब रावण को माता सीता का हरण करना था, अपने मामा मारीच के घर उन्हें सर झुका कर प्रणाम करते हुए मृग रूप धारण कर में राम जी को उस आश्रम से दूर जाने के लिए कहते हैं ताकि वे सीता का हरण कर सकें, यहां पर गोस्वामी जी कहते है नीच लोग कभी सुधर नही सकते हैं जब उन्हें अपना काम निकालना होता है, तब सज्जन बन जाते है ये उसी सांप की तरह होते हैं जो हमेशा ही टेढा मेढा होता है लेकिन जब उसे बील में घुसना होता है तो वह सीधा हो जाता है

 इस तरह आज का सत्संग संपन्न हुआ

 जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम

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