संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन - fastnewsharpal.com
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संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन

 संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन




प्रतिदिन की भांति संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा ऑनलाइन सत्संग का आयोजन सीता रसोई संचालन वाट्सएप ग्रुप में एवं उनके विभिन्न ग्रुपों में प्रातः 10:00 बजे प्रतिदिन किया जाता है, जिसमें सभी भक्तगण जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते हैं

            बाबाजी के युटुब चैनल  rambalakdas

पर प्रसारित किया जाने वाला बाबा जी की पाती में अभी वर्तमान में बाबा जी के द्वारा उनके बचपन की यादें कार्यक्रम प्रसारित किया जा रहा है जिसका भक्तगण प्रतिदिन खूब लाभ एवं आनंद प्राप्त कर रहे हैं, एवं अपने उस आनंद का अनुभव भी प्रतिदिन ग्रुप में प्रेषित कर रहे है

आज के सत्संग में श्री रोम साहू भरदा.ने विभीषण जी के जीवन चरित्र और जन्म के संबंध में जानने की जिज्ञासा रखी 

इन की जिज्ञासा पर चर्चा करते हुए पूज्य बाबाजी ने कहा कि जब रावण ने कौशल्या का हरण किया सुनकर आपको आश्चर्य होगा सीता का तो हरण किया रावण ने किया ही था लेकिन कौशल्या के कोख से राम का जन्म होगा यह जानकर रावण ने कौशल्या का हरण भी कर लिया था हरण करके कौशल्याजी को एक मत्स्य सुंदरी नाम की राक्षसी के पास रख दिया था तब छल से ब्रह्मा जी ने दस सिर वाले रावण का रूप धारण करके कौशल्या को मुक्ति दिलाई  और देवताओं ने दशरथजी और कौशल्या का  वन प्रांत में गुप्त तरीके से ब्रह्म विवाह का आयोजन किया जब रावण को यह पता चला तो रावण ने पुष्पक विमान के द्वारा उस जंगल में जाकर विवाह को रोकने की चेष्टा की लेकिन विवाह तब तक हो चुका था दशरथजी कौशल्या जी को लेकर चले गए थे लेकिन कहते हैं कि कौशल्या जी बहुत  रूपवान थी इतने मोहित थे  दशरथ जी उन पर कि जब विवाह के फेरे लग रहे थे तो दशरथ जी का तेज स्खलित हो गया और उन्होंने एक घड़े में उस तेज को रख दिया वही घड़ा रावण को वहां ज्योतिपुंज के रूप में प्राप्त हुआ रावण ने वो घड़ा ले जाकर लंका में स्थापित किया और समयानुसार उसी में ऋषियों के प्रयोग के द्वारा विभीषण की उत्पत्ति हुई रावण ने भाई की तरह उसका पालन पोषण किया है लेकिन राम जी के बड़े भाई होने के कारण भगवान राम ने अपने राज्याभिषेक को ठुकरा कर पहले विभीषणजी का राजतिलक किया तब अयोध्या में आकर अपना राज तिलक करवाया ।

       इसी क्रम में श्री रामफल जी बकेला ने जिज्ञासा रखी कि गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों कटवाया था । बाबाजी ने बताया रामफल जी 

"एकलव्य की कथा "महाभारत के एक ऐसे पृष्ठ की कथा है जिसको कहकर सुनकर कहीं ना कहीं मन दुखी हो जाता है कि आखिर एकलव्य के साथ ऐसी घटना क्यों घटी वह कौन सी मनहूस घड़ी थी कि जिसमें द्रोणाचार्य जी ने एकलव्य से अंगूठा मांगा हमने बचपन में ही गुरु भक्ति के नाम पर एकलव्य की कथा सुनी तब हम बहुत छोटे थे मंगसा वाले गुरुजी ने ही हमको यह पाठ पढ़ाया था "एकलव्य की गुरुभक्ति" उस समय यह बात इतनी अच्छी लगती थी  कि सही है गुरु ने अंगूठा मांगा काट के दे दिया एकलव्य बिल्कुल सही है पर उस समय द्रोणाचार्य के प्रति उंगली उठाना हमारे मस्तिष्क में बुद्धि में नहीं थी हमारी क्षमता नहीं थी लेकिन धीरे-धीरे जब गुरु शिष्य की परंपरा को हम देखते गए और फिर बाद में दूसरा पक्ष भी हमने देखा जो पक्ष मोह का है द्रोणाचार्य मोह के वशीभूत एकलव्य से अंगूठा मांगते हैं , एकलव्य की ना तो गुरु भक्ति से वे प्रभावित हैं ना एकलव्य के शास्त्र दीक्षा से केवल अर्जुन को बलवान बनाने के लिए द्रोणाचार्य ने मोहवश एकलव्य का अंगूठा मांगा

कहते हैं कि एकलव्य नीची जाति का था इस कथा से यह भी समझ में आता है कि महाभारत काल में और द्रोणाचार्य के आश्रम में भी छुआछूत चलता था अमीर गरीब का भेद देखा जाता था जबकि दूसरी तरफ भगवान कृष्ण की शिक्षा जहां पर शिक्षा हुई है वहां गरीब सुदामा को भी स्थान मिला है  श्रीकृष्ण के जीवन में जो संस्कार हैं उस आश्रम में पलने के कारण हैं जिस आश्रम में सबके लिए समान भाव है लेकिन दुर्योधन और कौरवों के मन में इतना पाप गुरु की शिक्षा के बाद भी कम नहीं हुआ उसका कारण यह भी हो सकता है कि द्रोणाचार्य जिस आश्रम में शिक्षा पढ़ाते थे वहां छुआछूत ऊंच-नीच का भेद था एकलव्य का अंगूठा को मांगने के कारण एकलव्य तो प्रसिद्ध गुरुभक्त बन गए लेकिन द्रोणाचार्य जी के जीवन में कलंक जरूर लग गया वैसे भी गुरु द्रोणाचार्य जी की जो शिक्षा पद्धति है उनका गुरुकुल है वो क्यों स्थापित किया गया है बच्चों में ज्ञान देने के लिए नहीं यदि आप पृष्ठभूमि देखें द्रोणाचार्य की कथा देखें तो द्रोणाचार्य ने अपने मित्र से बदला लेने के लिए गुरुकुल खोला था एक बदले की भावना से खोला गया विद्यालय और बदले की भावना से अर्जुन को बलवान बनाना ताकि यह बलवान बनकर मेरे मित्र का अपमान करें और मुझे सुख पहुंचे यह कथा हम आपको थोड़ा बताते हैं

जब द्रोणाचार्य को लगा कि एकलव्य इतना बलवान है कि मेरी केवल प्रतिमा के सामने विद्या  अध्ययन करते हुए बिना गुरु के मार्गदर्शन के इतना बलवान है कि कुत्ते के मुंह में बान भर दिया पर उस कुत्ते को खरोच भी नहीं आई बाण कितनी गति से चलाना है कि मुँह में जाकर लग जाए फिर भी  उसको चोट न पहुंचे सोचिए कितना अद्भुत धनुर्विद्या यदि गुरु द्रोणाचार्य समभाव रखते तो एकलव्य के सिर पर हाथ रख देते कहते बेटा जिस तरह अर्जुन मेरा शिष्य है तू भी मेरा शिष्य है और यदि उसे शिष्यत्व दे देते तो आप देखिए कि पांडव पांच नहीं 6 होते और महाभारत का 18 दिन नहीं चलता 8 दिन में ही निर्णय हो जाता क्योंकि एकलव्य जैसा महान धनुर्धर पांडवों के पक्ष में होता है हम यही गलती करते हैं हम धर्म के मार्ग में चलने वाले लोग अच्छे कर्म करने वाले लोग अच्छे काम करने वालों को ही नीचा दिखाते हैं और इसीलिए हमारी अच्छाई छोटी हो जाती है और बुरा काम करने वाले !परिणाम क्या हुआ एकलव्य का अंगूठा कटवा दिया एकलव्य को बहला-फुसलाकर भड़का करके दुर्योधन ने अपनी सेना में शामिल कर लिया अकेले एकलव्य ने महाभारत के युद्ध में पांडवों को कमजोर कर दिया कई अक्षुन्ही सेना उनकी मार डाली इसीलिए हम कहते हैं जहां पर सत्य धर्म और अच्छी कला विद्या हो तो जाती पाती छुआछूत ऊंच नीच भुलाकर उस विद्या को आगे बढ़ाना चाहिए ना कि उसको नीचा दिखाना चाहिए।

   प्रकार आज का सत्संग बाबा जी के सु मधुर भजन के साथ संपन्न हुआ...

 जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम

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