पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के अनमोल वचन - fastnewsharpal.com
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पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के अनमोल वचन

 *जिन वस्तुओं के कारण तुम्हारा धर्म छूटे समझना वो बैरी है अभिशाप है*



पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के अनमोल वचन

    सुरेन्द्र जैन /धरसीवां

   इन दिनो जैन धर्म के जैन धर्म के पर्वाधिराज पर्युषण पर्व की सभी जगह धूम है समाज के लोग मंदिरों में सुबह से विशेष पूजन विधान के बाद कोई एकाशन व्रत तो कोई दस दस दिन के निर्जला उपवास तक कर रहे है ऐंसे में  पर्वाधिराज पर्युषण पर्व जिन्हें दशलाक्षण महापर्व भी कहा जाता है आख़िर क्या है जीवन मे इस महापर्व का महत्व आइए पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के चतुर्थ दिवस पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के उत्तम शौच धर्म पर अनमोल वचनों का श्रमण कर जानते है क्या है उत्तम शौच धर्म।

जाप-ओं ह्रीं उत्तम शोचधर्मांगाय नम:

चन्द्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी

**निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्रमण संस्कृति रक्षक108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा*

*जिस जिस-जिस वस्तु के कारण तुम्हारा धर्म छूटे वो समझना बैरी है अभिशाप हैं*

1.दुश्मन कौन-दरवाजे पर जो गंदगी फैली होगी तो तुम्हारे लिए नकारात्मक ऊर्जा देगी इसलिए पहले की महिला ये घर के दरवाजे के आगे सफाई करके रंगोंली बनाती थी जिस जिस वस्तु के कारण तुम्हारा धर्म छूटे समझ लेना वह तुम्हारी दुश्मन है अभी दरवाजे पर खड़ा हूँ कौन सी वस्तु मुझे गुरु से दुर कर रहीं हैं ।

2.जिंदगी को दांव पर नहीं-तीसरे झाढू राजपथ पर लगाओ जो तुम्हारी नहीं है जो धन मुझे समर्पित है लेकिन मैरा नहीं हैं जुआ का धन भीख माँग लेना लेकिन जुआरी अपनी पत्नी का मंगल सूत्र तक दाँव पर लगा देता है नौकर्म मल हैं राज पथ में राजा के महल तक जो रास्ता जाये वही राज पथ है अब अपनी स्वयं की वस्तु पर ऐसा राग मत करना कि तुम्हारे ही कान कट जाये आचार्यो ने उन रागों की निंदा की जिनमें तुम्हारे प्राण ही चले जाये संगीत में सर्प दीपक से राग कर पतागां जल जाता है राग में इतना मस्त हो जाये कि व्रह्म मुहुर्त में ही ना ऊठ पाओ इतना कम से कम ध्यान रखना कि भगवान के अभिषेक में पहुँच जाऊ इतने रागी मत होना कि पर्व के दिन में गंदे मत होना तो समझ लेना कि श्रावक के घर में शोच धर्म का प्रवेश हो गया पर्व के दिन में अपनी पत्नी को भी राग से नहीं देखुंगा पर्व के दिन में अपने हाथ को अपने मन तन को गंदे नहीं करूँगा इतना सन्तोष तो धारण करों कि एक माला तो दे सकूँगा मैं कालातिक्रमण नहीं करूँगा बहुत पुण्यात्मा हो लेकिन इतना देख लेना कि वह तुम्हें धर्म से तो दुर नहीं कर रहा।

3.वस्तु को मत चाहना-आज ये नियम लो मैं उस वस्तु को नहीं चाहूँगा जो मुझे देखेगी ही नहीं क्या यह वस्तु पा सकूगा यदि मन कहे कि नहीं तो तुरंत त्याग कर देना खुंखार पापी को पानी पिला पिला कर मारते हैं उसे मरने नहीं देते दशहरा मैदान में आज तक क्यों जलाया जा रहा है लाखो साल से रावण को जिंदा करके प्राण प्रतिष्ठा करके मारा जाता है ये नगर की सफाई नहीं की इसका परीणाम है हम उस पर क्रोध नहीं करेंगे जिसका हम कुछ बिगाड़ नहीं सकते ऐसे व्यक्ति से मान नहीं करना जिसके सामने हम बराबरी नहीं कर सकते ऐसे व्यक्ति से मायाचारी मत करना जिसे तुम फंसा ही नहीं सकते ऐसी वस्तु को मत चाहना जो प्राप्त हो ही ना सके।

4.बहार से सफाई पहले-शौच धर्म कहता है कि जो भी इसको स्पर्श करेगा वह गंदा हो जाएगा शौच धर्म ने सन्तोष को भेजा सन्तोष से शुरू होता कहों आत्मा में शुचि धर्म पैदा करता है तो नगर के बाहर से साफ करता है तीर्थंकर जब अवतरित होते हैं तब माता के गर्भ का शोधन ही नहीं किया जाता सबसे पहले अयोध्या नगरी के बाहर से सफाई प्रारम्भ की जाती हैं हर शहर नगर के बाहर गंदगी मिलेगी पहला प्रहार किया जैन दर्शन जो तुम्हारी थी है नहीं होगी नहीं सबसे ज्यादा आत्मा गंदा इनही से गंदा होता हैं सबसे ज्यादा मन तुम्हारा उन वस्तु पर जाता है  जो तुम्हारी थी नहीं है होगी नहीं ये बहार की गंदगी हैं

5.लोभ को गंदगी कहा-लोभ को धोने वाला आज तक पैदा नहीं हुआ कभी कोई धोता नहीं है हम गंधे होने पर साफ करते हैं लेकिन गंधा होने कोई छोड़ता लोभ को कोई नहीं धो सकता धोबी भी नहीं,धंधा होना छोड़ते नहीं धोए उसे जो गंधा महसूस हो यह कौन सी बीमारी है कि ये आदमी अपने आप को भी मार ही नहीं सकता यह वह गंदगी है जिसको गंधा कहां नहीं जाता।सारी दुनिया को गंदगी महसूस करने वाले स्थान पर सूकर रहता है उसे वह स्थान गंदा लगता ही नहीं हैं क्रोध मान माया लोभ में लोभ को गंधा लगता ही नहीं हैं लोभ कषाय ने हमें अंधा वना दिया हमें लोभ पाप दिखता ही नहीं हैं द्वेष पकड़ में आता है राग तो पकड़ में भी नहीं आया क्रोध मान माया  को मल की संज्ञा नहीं दी मात्र लोभ है जिसे मल की संज्ञा दी गई है।

6.लोभ-शुर्चि भावोःशौच ये किसीका नाश नहीं करता तीनों धर्म नाश तिरोहित करते हैं छुपते हैं छुपाते हैं ये मलीन करता है गंदा करता है। क्रोधी मानी मायावी से व्यक्ति से आदमी डरता,जुडता नहीं हैं।लोभी किसी को तोड़ेगा नहीं,जोड़ता हैं  गंधा करता है

*प्रवचन से शिक्षा*-पर्व के दिनों में गंदा मत होना पर्व के दिनों में गंदा खाना नहीं खाऊंगा अभक्ष नही खाना।

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