आज का सुविचार(चिन्तन) - fastnewsharpal.com
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आज का सुविचार(चिन्तन)

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💠 *Aaj_Ka_Vichar*💠

🎋 *..15-09-2021*..🎋


✍🏻जब जड़ों द्वारा वृक्षों को नया रस मिलता है, तभी वह हरे-भरे होते हैं, इसी प्रकार जब मनुष्यों में श्रेष्ठ विचारणाओं और भावनाओं का संचार होता है, तो वह उल्लासित होने लगते हैं।

💐 *Brahma Kumaris Daily Vichar* 💐

🌷 *σм ѕнαитι*🌷

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  💥 *विचार परिवर्तन*💥


✍🏻जैसे उबलते पानी में कभी, परछाई नहीं दिखती, ठीक उसी प्रकार परेशान मन से समाधान भी नहीं दिखते, शान्त होकर देखिए, सभी समस्याओं का हल मिल जायेगा।

🌹 *Brahma Kumaris Daily Vichar*🌹

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*ओम शांति ब्रह्मा मुख द्वारा निराकार  शिव भगवानुवाच l* 

♥ मीठे बच्चे इस समय एक परमात्मा पिता की याद में रहना ही, है बहुत-बहुत बहुत जरूरी l 🇲🇰

🦅इस अंतिम समय में मुक्तिधाम घर जाने की, यह अंतिम यात्रा है हमारी l जहां रहते हैं, मीठे पिता परमात्मा और हम आत्माएं सारी l 💁🏻‍♂️

🌏इस सृष्टि रंगमंच पर, 84 जन्मों का पार्ट बजाया हमने, बनकर के पार्ट धारी l इस समय यह संसार बना है, पतित दुखी भ्रष्टाचारी l चारों तरफ है अनेक बीमारी,महामारीl🔌 

🎥इस कीचड़े वाली गंदी दुनिया का, महाविनाश भी है महाभारी l सारे विश्व ने कर ली है, इसकी भी तैयारी l पांच तत्व भी बन रहे हैं, महा विकराल रूपधारी l 🦅

🙊5 विकारों रूपी रावण भी, लगा रहा है अपनी ताकत सारी l अनेक धर्मों की भी है मारामारी l देह अभिमान की दिखा रहे हैं सभी, मगरूरी l 🧑🏿‍🦲

🎙️अब अनेक जन्मों से, जिनका इंतजार कर रही थी आत्माएं सारी l वह परमात्मा हस्ती, प्राणों से प्यारी l प्रजापिता ब्रह्मा के तन मे , करके सवारी l 🎙️

🌺आ गए वह, सर्वशक्तिमान ज्योति बिंदु शिव निराकारी l उनके जैसी ही हम आत्माएं है, इस देह से न्यारी अशरीरी l🌺 

🔆इस साकारी दुनिया में आकर, लिया है हमने देह साकारी l अब निरंतर परमात्मा पिता की याद में रहना, हम बच्चों की है जिम्मेवारी l🙏🏼 

👍🏻इससे ही बनेंगे हम, निराकारी, निर्विकारी, निअहंकारी I फिर पवित्रता सुख शांति संपत्ति से भरी, यह दुनिया होगी पावन, स्वर्ग नगरी l👍🏻

*ईश्वर*

*एक दिन सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी । दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है ।*

*मैंने कहा, "जी कहिए.."*

*तो उसने कहा,*

*अच्छा जी, आप तो  रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे,*

*मैंने  कहा*

*"माफ कीजिये, भाई साहब ! मैंने पहचाना नहीं, आपको..."*

*तो वह कहने लगे,* 

*"भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया है... अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र मे बसे हो पर नज़र नही आते.. लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"*

*मैंने चिढ़ते हुए कहा,*

*"ये क्या मज़ाक है?"*

*"अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हे ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख- सुन नही पायेगा, मुझे।"*

*कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी.. "अकेला ख़ड़ा- खड़ा  क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है , चल आजा अंदर.."*

*अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था, तो बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पिया मैं गुस्से से चिल्लाया,*

*"अरे मां..ये हर रोज इतनी  चीनी ?"*

*इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नही आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी  दिया कि 'भई, तुम नज़र में हो आज... ज़रा ध्यान से।'*

*बस फिर मैं जहाँ- जहाँ... वह मेरे पीछे- पीछे पूरे घर में... थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..*

*मैंने कहा,*

*"प्रभु, यहाँ तो बख्श दो..."*

*खैर, नहा कर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में  महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, 'तुम नज़र मे हो।'*

*कार को साइड मे रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते- करते कहने ही वाला था कि 'इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे' ...पर ये  तो गलत था, : पाप था तो प्रभु के सामने कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,"आप आ जाइये । आपका काम हो  जाएगा, आज।"*

*फिर उस दिन आफिस मे ना स्टाफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की 25 - 50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जाती थी मुँह से, पर उस दिन  सारी गालियाँ, 'कोई बात नही, इट्स ओके...'मे तब्दील हो गयीं।*

   *वह पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द , बेईमानी, झूठ ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नही बनें*।

*शाम को आफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया...*

*"प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभायें... उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी..."*

*घर पर रात्रि भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,*

*"प्रभु, पहले आप लीजिये ।"*

*और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। भोजन के बाद माँ बोली,* 

*"पहली बार खाने में कोई कमी नही निकाली आज तूने। क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या, आज?"*

*मैंने कहाँ,*

*"माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है... रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद मे कोई कमी नही होती।"*

*थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग  के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,*

*"आज तुम्हे नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।"*

*गहरी नींद गालों पे थपकी से टूटी ...*

*"कब तक सोयेगा .., जाग जा अब।"*

*माँ की आवाज़ थी... सपना था शायद... हाँ, सपना ही था पर नीँद से जगा गया... अब समझ में आ गया उसका इशारा...*

 *"तुम नज़र में हो...।"*

*जिस दिन ये समझ गए कि "वो" देख रहा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सपने में आया एक विचार भी आंखे खोल सकता है।*

*बस हमेशा याद रखो कि.....*

*हम सांसारिक कैमरे की नही बल्कि प्रभु के कैमरे की नजर में हर समय हैं* 
🙏🏻🌹🙏🏻




💐💐💐💐💐💐💐💐💐
         ओम शांति
*दर्द न होता तो खुशी की किंमत न होती* 

*अगर मिल जाता सब कुछ   केवल चाहने से*

*तो दुनिया मे "उपरवाले " की जरूरत ही न होती !!*
       ॐ शांति
💐💐💐💐💐💐💐💐💐
🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻
ओम शांति
*कठिन परिस्थितियों में*

*संघर्ष करने पर एक*

*बहुमूल्य संपत्ति विकसित*

*होती है*

*जिसका नाम है*

" *आत्मबल*"
      ॐ शांति
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
💧 *_आज का मीठा मोती_*💧
_*15 सितम्बर:-*_ मन में सदा परमात्मा की याद मन की उल्ज़न को दूर करती है, और निर्णय शक्ति को बढाती है।
        🙏🙏 *_ओम शान्ति_*🙏🙏
       🌹🌻 *_ब्रह्माकुमारीज़_*🌻🌹
💥🇲🇰💥🇲🇰💥🇲🇰💥🇲🇰💥🇲🇰
🙏 *ॐ शांति* 🙏

अच्छा समय सिर्फ उसी का होता है जो कभी किसी का *बुरा* नहीं सोचते। सुख-दुःख तो *अतिथि* हैं, बारी-बारी से आयेंगे...चले जायेंगे। यदि वो नहीं आयेंगे तो हम *अनुभव* कहाँ से लाएंगे!!

🌸 सुप्रभात...

💐💐 आपका दिन शुभ हो... 💐💐
*कुछ चीजें समीप जाने पर बगैर मांगे मिल जाती हैं जैसे...*
*बर्फ के पास शीतलता, अग्नि के पास गर्माहट और गुलाब के पास सुगंध।*

*भगवान👆🏻💫  से मांगने की बजाए निकटता🏛️🚶🏻‍♀️🚶🏻‍♂️👬🏻👭🏻👫🏻👨‍👩‍👧‍👦 बनाइए, सब कुछ अपने आप मिलना शुरू हो जाएगा।*


*इस तरह👩🏻😊👦🏻 मुस्कुराने की*
*आदत डालिये कि ..!*

*परिस्थिति🚶🏻‍♀️😷🚶🏻‍♂️ भी आपको🤦🏻‍♀️🤦🏻‍♂️परेशान*
*कर - कर के थक जाए ...!!*

*और जाते जाते बोले*

*आप👭🏻👬🏼👫🏻👩🏻😊👦🏻से मिल🤝🏻कर😊 खुशी हुई ...!!!*                        

*_Good👆🏻💫🇲🇰🌅🧘🏻‍♀️🧘🏻‍♂️morning._*

                 ..                                     *_दो गज🚶🏻‍♀️😷🚶🏻‍♂️ दूरी बहुत बहुत है जरूरी, सुरक्षित रहे, स्वस्थ रहे, अपनों👭🏻👬🏼👫🏻👨‍👩‍👧‍👦 के साथ मस्त रहे, अपना👩🏻💫👦🏻 खयाल रखें।_*

♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी♦️♦️♦️


*विचारणीय कहानी 🏵️

🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅

नाव डूबने के बाद नाविक और पांच-सात कुशल तैराक नदी में तैरकर अपनी-अपनी जान बचाये. उधर नाव, सबको नदी में छोड़.. खुद आगे निकल गई.


बचे हुए लोग राजा के दरबार में पेश किये गये - राजा ने नाविक से पूछा-

नाव कैसे डूबी!

नाव में छेद था क्या?


नाविक- नहीं महाराज! नाव बिल्कुल दुरुस्त थी.


महाराज- इसका मतलब, तुमने सवारी अधिक बिठाई!


नाविक- नहीं महाराज! सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थे और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर नाव पार लगाई है.


राजा- आंधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी!

नाविक- मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज.


राजा- मदिरा पान तो नहीं न किया था तुमने.


नाविक- नहीं महाराज! आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं.


महाराज- फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना?


नाविक- महाराज! नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी. तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया. मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि "तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?"

उसने उपहास में कहा कि "क्या मेरे नाव थूकने से नाव डूब जायेगी." 

♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी♦️♦️♦️


*विचारणीय कहानी 🏵️

🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅

नाव डूबने के बाद नाविक और पांच-सात कुशल तैराक नदी में तैरकर अपनी-अपनी जान बचाये. उधर नाव, सबको नदी में छोड़.. खुद आगे निकल गई.


बचे हुए लोग राजा के दरबार में पेश किये गये - राजा ने नाविक से पूछा-

नाव कैसे डूबी!

नाव में छेद था क्या?


नाविक- नहीं महाराज! नाव बिल्कुल दुरुस्त थी.


महाराज- इसका मतलब, तुमने सवारी अधिक बिठाई!


नाविक- नहीं महाराज! सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थे और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर नाव पार लगाई है.


राजा- आंधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी!

नाविक- मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज.


राजा- मदिरा पान तो नहीं न किया था तुमने.


नाविक- नहीं महाराज! आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं.


महाराज- फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना?


नाविक- महाराज! नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी. तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया. मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि "तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?"

उसने उपहास में कहा कि "क्या मेरे नाव थूकने से नाव डूब जायेगी." 


मैंने कहा- "नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हम शर्म से डूब रहें हैं.. बताओ!जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में थूक रहे हो.


राजा- फिर?


नाविक- महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया बोला पैसा देते हैं नदी पार करने के. कोई एहसान नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव.


राजा (विस्मय के साथ)- पैसा देने का क्या मतलब! नाव में थूकेगा? अच्छा! फिर क्या हुआ?


नाविक- महाराज वो मुझसे बहस करने लगा.


राजा-नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया?


नाविक- महाराज ऐसा नहीं था.. नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे.


राजा- तब तो उसका मनोबल टूटा होगा. उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा.


नाविक- ऐसा नहीं था महाराज! नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ खड़े हो गये तथा नाव के भीतर ही दो खेमे बंट गये. बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े.


राजा- चलती नाव में ही मारपीट! तुमने उन्हें समझाया तथा रोका  नहीं..


नाविक- रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की. मैने कहा " नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है. इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम-सबकी जान का खतरा बन जायेगी" लेकिन कौन मेरी सुने! सब एक दूसरे पर टूट पड़े.  तथा नाव ने बीच धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज.


*कहानी का सार*:- इस नाजुक दौर में संतुलन बनाये रखे ताकि नाव के संतुलन खोने से बाकी साथियों को नुकसान न हो।

मैंने कहा- "नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हम शर्म से डूब रहें हैं.. बताओ!जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में थूक रहे हो.


राजा- फिर?


नाविक- महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया बोला पैसा देते हैं नदी पार करने के. कोई एहसान नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव.


राजा (विस्मय के साथ)- पैसा देने का क्या मतलब! नाव में थूकेगा? अच्छा! फिर क्या हुआ?


नाविक- महाराज वो मुझसे बहस करने लगा.


राजा-नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया?


नाविक- महाराज ऐसा नहीं था.. नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे.


राजा- तब तो उसका मनोबल टूटा होगा. उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा.


नाविक- ऐसा नहीं था महाराज! नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ खड़े हो गये तथा नाव के भीतर ही दो खेमे बंट गये. बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े.


राजा- चलती नाव में ही मारपीट! तुमने उन्हें समझाया तथा रोका  नहीं..


नाविक- रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की. मैने कहा " नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है. इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम-सबकी जान का खतरा बन जायेगी" लेकिन कौन मेरी सुने! सब एक दूसरे पर टूट पड़े.  तथा नाव ने बीच धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज.


*कहानी का सार*:- इस नाजुक दौर में संतुलन बनाये रखे ताकि नाव के संतुलन खोने से बाकी साथियों को नुकसान न हो।

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