पर्वाधिराज पर्युषण पर्व का आठवां दिन उत्तम त्याग पर पुज्य निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के अनमोल वचन
पर्वाधिराज पर्युषण पर्व का आठवां दिन उत्तम त्याग पर पुज्य निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के अनमोल वचन
सुरेन्द्र जैन /धरसीवां
जाप-ओं ह्रीं उत्तम त्याग धर्मांगाय नम:
चन्द्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी
**निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव दिव्य ज्ञान के धारी108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा*
*अच्छी वस्तु का त्याग अच्छे व्यक्ति को दे दो*
1.शुभ से निवृत्ति कठिन-तुम तपस्वी बनना चाहते हो तो अच्छा नहीं सुनना,अच्छा भी नहीं देखना पूजा भी नहीं पड़ुगा घुटन हो जायेगा एक बार सुधासागरजी ने मौन रखा अशुभ से तो निवृत्ति थी शुभ से भी निवृत्ति हो जाओ आचार्य श्री ने कहा कि बोलना भूल जाओगे अशुभ को छोड़ना सरल है शुभ को छोड़ना कठिन होता है घुटन होतीं हैं जैसे संसार में अशुभ को छुड़ा दिया तो संयम में शुभ को भी छोड़ना तप है ।
2.अच्छी चीज का त्याग-रोटी नहीं खाना पानी नहीं पीना भक्ष का त्याग आज मन्दिर भी नहीं जाना मन्दिर भी नहीं करना शुभ का त्याग गुरु को आहार नहीं देंगे शुभ का भी त्याग कर दिया उपवास के दिन मंजन नहीं करना स्नान नहीं पूजन नहीं श्रावक के आवश्यक छुड़ा दिये आचार्य श्री समतभंद्र स्वामी ने शुभ से भी निवृत्ति कराई तुम जिसे अच्छाई मानते हो तो अच्छाईयो का भी त्याग कर देना अच्छी चीज फेंकना नही है धन दौलत सब अच्छी चीजें का त्याग कर धर्म करना।
3.शुभ का त्याग-अशुभ चीज का त्याग नहीं होता ये तो हेय है शुभ का त्याग कराया है शुभ का त्याग कराकर धन का दान दो आवास का दान दो घर छोड़ दिया तो तुम आवास दान दो जिन जिन शुभ वस्तुओ का त्याग कर दिया तो फेंकना नहीं है उनका दान दो,दान में मन्दिर बनाओ
4.अच्छी जगह दान-भादो के दस धर्म ग्रहस्थो के लिए ही है दस धर्म में जो जो छुड़या उसका दान दे दे दान तपस्या का फल बिना तप के दान हो ही सकता तपस्वी का मन घर बनने का नहीं होगा मन्दिर बनाने का होगा ग्रहस्थ हूँ तो धन का उपार्जन तो करूँगा तो मेरा मन करता है कि भगवान का मन्दिर बनाकर मंरू.
5.तप कब-संसार में ऐसा कोई है जो किसी ना किसी को माॅ बहन बेटी कह देता है इन सबसे ऊपर उठकर जिस दिन तुम्हें माॅ बहन की जगह चेतंन आत्मा दिखने लगे तप होता हैं
6.फुलो से गुलदस्ता कैसे- सम्यकदर्शन प्राप्त किया मतलब फूल मिल गया लेकिन माला नहीं है वैसे ही सम्यकदर्शन सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र को मिलाकर गुलदस्ता बनता हैं जो सम्मान का प्रतीक है अभेद हैं सो अलग अलग मत जानो अलग अलग रास्ते पर चलने से मंजिल नहीं मिलेगी एक से काम नहीं चलेगा एक भी टूट गया तो विकलांग माना जाता है इसलिए संगठन बनाओ फूलों के समूह को ही तो माला कहकर आये हैं।
7.फुल गुलदस्ता-किसी एक पर मत रुको फूल पर रुक जाओगे तो गुलदस्ता नहीं मिलेगा गुलदस्ता सम्मान हैं,फूल दिया है स्वीकार कर रहा है गुलदस्ता देकर सम्मान व स्वीकार किया है फूल को हार नहीं माना फूलो की श्रखंला वनाकर माला बना देते हैं फूल से सम्मानित नहीं किया जाता फूलों के समूह या गुलदस्ता या माला देकर सम्मानित कर रहा है फूल भेंट करें तो समझ लेना तुम्हें चाह रहा है सम्मान होता हैं गुलदस्ता भेंट करता है तो समझ लेना तुमने कुछ अच्छा कार्य किया है उसको स्वीकार कर लिया गया है।
8.अभेद-किसी एक कार्य के पीछे पड़ जाते हैं वो कार्य नहीं होता तो हम हताश हो जाते हैं अभेद रत्नत्रय की चर्चा बहुत बड़ी है ज्ञान ही हमारा स्वभाव होता तो अभेद की चर्चा नहीं होती दर्शन ही हमारा स्वभाव होता तो अभेद की चर्चा क्यों इसका मतलब दर्शन ज्ञान दोनों चाहिए।
*प्रवचन से शिक्षा*-मिलाओं और मिलके करों
सकंलन ब्र महावीर भैया जी
