जैंसे वृक्षो से छाया शीतलता मांगना नही पड़ती उसी तरह तपस्वी मुनिराजों से कुछ मांगना नही पड़ता उनकी छत्रछाया में स्वतः आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है-मुनिश्री सौम्यसागर जी
जैंसे वृक्षो से छाया शीतलता मांगना नही पड़ती उसी तरह तपस्वी मुनिराजों से कुछ मांगना नही पड़ता उनकी छत्रछाया में स्वतः आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है-मुनिश्री सौम्यसागर जी
सुरेन्द्र जैन/धरसींवा (अविनाश जैन विदिशा)
*"किसी वृक्ष के नीचे जाकर कभीआपने वृक्ष से कहा है कि हे वृक्ष आप मुझे छाया प्रदान कर दो? जैसे वृक्ष के नीचे जाकर उससे छाया मांगनी नहीं पड़ती वह तो स्वमेव मिल जाया करती है,उसी प्रकार साधु तो उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव,सत्य, शौच,संयम,तप, आकिंचन और वृहम्चर्य दस धर्मो की प्रतिमूर्ति है, उन साधुओं के पास आकर क्षमा मांगने की कोई आवशक्ता ही नहीं है, वह तो क्षमाधर्म की प्रतिमूर्ति है,जैसे वृक्ष के नीचे जाकर आप खड़े होते हो तो शीतलता और छाया स्वमेव मिल जाती है।उपरोक्त उदगार मुनि श्री सौम्यसागर जी महाराज ने दशलक्षण धर्म के प्रथम दिवस उत्तम क्षमा धर्म पर प्रवचन करते हुये व्यक्त किये।*
उन्होंने कहा कि "हंसने के लिये खुश रहना जरूरीहै, औरखुश रहने के लिये सहना जरूरी है"
जितनी जितनी सहन शक्ती आपके अंदर बड़ती चली जाऐगी उतने उतने आप अंदर से खुश होते चले जाऐंगे। मुनि श्री ने कहा कि सहन शक्ती मात्र शव्दों से नहीं आती सहनशीलता के लिये अभिमान का दान करना जरुरी होता है,जैसे जैसेअभिमान घटता है,वैसे वैसे आपकी साधना वड़ती चली जाती है।
"क्रोध क्यू आता है" पर मुनि श्री ने कहा कि मनुष्यों का जीवन इच्छाओं और आपेक्षाओं से भरा हुआ है,आपेक्षाऐं और इच्छाऐं जब पूर्ण नहीं होती तो व्यक्ती के अंदर कुंठा उत्पन्न होती है,और वही कुंठा क्रोध का कारण वनती है, क्रोध को पूर्ण करने के लिये व्यक्ती मायाचारी करता है, और उस मायाचारी से जब काम वन जाता है,तो फिर लोभ की प्रवत्ति सवार होती है। यानि कि एक "इच्छा और अपेक्षा" ही ऐसा दुर्गुण है जो कि क्रोध मान माया लोभ चारों कषायों को एक साथ उपस्थित कर देता है।
उन्होंने कहा कि हालांकि क्रोध की शुरुआत मूर्खता के साथ प्रारंभ होती है,और पश्चाताप पर जाकर समाप्त भी हो जाती है।
गल्ती सामने बाले ने की और क्रोध करने वाला व्यक्ती सजा खुद को देता है। क्रोध को यदि न दवाया जाऐ तो वह बदले में वह हरे भरे घर को नष्ट कर देता है, एवं उन घावों को तब तक हरा भरा रखता है, जब तक की वह घाव नासूर न वन जाऐ।
आचार्य गुरूदेव कहते है कि जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो वह रास्ता कायरों का नहीं वीरों का है या तो अपना साहस बड़ा लो या फिर उस मार्ग को छोड़ दो। उसी प्रकार उत्तम क्षमा कायर व्यक्ती कभी नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ती के पास अनंतवल की शक्ती है,उस अनंतवल को पाने के लिये संकल्प शक्ती और आत्म वल की आवशक्ता होती है, बिचार तो प्रत्येक व्यक्ति के अंदर उठा करते है लेकिन उन बिचारों को संकल्प के रुप में कोई कोई ही गृहण कर पाता है। और जो बिचार संकल्प के रुप में आ जाते है तो वही विचार आदर्श के रुप में उपस्थित हो जाते है। उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया प्रातः5:45 से मंगलाचरण के साथ अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न होकर पर्व पूजा भक्ती संगीत के साथ शीतलधाम सहित विदिशा नगर के सभी जिन मंदिरों में संपन्न हुई।
