छत्तीसगढ़ी लेख
"महँगाई के देवारी"
मंगलवार, 2 नवंबर 2021
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"महँगाई के देवारी"
कइसन जल्दी देख, आज आगे देवारी।
महँगाई के मार, बाढ़ गे अब्बड़ भारी।।
छूवत हे आगास, तेल घी अउ तरकारी।।
काला महूँ बताँव, रोज खाथँव जी गारी।।
ले के झोला हाथ, हाट मा मंँय हर जाथँव।
बाढे़ देखे दाम, मुँड़ी अपने खजुवाथँव।।
भिंडी आलू प्याज, सखा मोला रोवाथे।
काला धर के जाँव, सुवारी मोर सुनाथे।।
रोवत लइका आज, पटाखा मोला चाही।
ले दे पापा मोर, सिवा नइ लेवँव काही।।
नोनी घलो रिसाय, नवा ले दे गा कपड़ा।
महँगाई ला देख, अबड़ होवत हे लफड़ा।।
हावय जेन अमीर, फरक ओला नइ होवत।
ताँकत मुँहूँ गरीब, माथ ला धर के रोवत।।
कुरसी बइठे आज, मजा नेता ह उड़ावत।
गरीबहा के लूट, लूट के नेता खावत।।
रचनाकार
प्रिया देवांगन "प्रियू"
पंडरिया
जिला - कबीरधाम
छत्तीसगढ़
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