अच्छाईयों की अपनी ओरिजिनल स्टेट में वापस आएँ (भाग 2) - fastnewsharpal.com
फास्ट न्यूज हर पल समाचार पत्र,

अच्छाईयों की अपनी ओरिजिनल स्टेट में वापस आएँ (भाग 2)

  अच्छाईयों की अपनी ओरिजिनल स्टेट में वापस आएँ (भाग 2)






व्यक्तित्व स्तर पर, अच्छाईयां हमारा ओरिजिनल नेचर है जबकि बनावटी या नकारात्मक व्यक्तित्व विशेषताएँ हम एक्वायर करते हैं। एक व्यक्ति जो जीवन भर अच्छे कर्म न कर सके, लेकिन वास्तव में उसका मूल स्वभाव बहुत अच्छा होता है और दूसरी ओर एक व्यक्ति जिसका किरदार जीवन भर अच्छा रहा हो, वह मूल रूप से और भी बेहतर होता है। इसका कारण यह है कि, हम अपने दृष्टिकोण को एक जन्म की वास्तविकता तक ही सीमित नहीं रखते क्योंकि असल में यह एक झूठी वास्तविकता है जबकि एक सच्ची वास्तविकता कई जन्मों की होती है।


एक मनुष्य का शरीर अस्थायी होता है लेकिन एक आत्मा अनन्त यानि इटर्नल होती है।

इसलिए, जब एक आत्मा अपने जीवन के जन्म-पुनर्जन्म की कहानी में, अपनी भूमिका निभाना शुरू करती है, तो उसका मूल स्वभाव अच्छा ही होता है। आत्माएं; शांति, आनंद, प्रेम, सुख, पवित्रता, शक्ति और ज्ञान के सात गुणों से भरपूर होती हैं। जब यह शरीर के द्वारा अपनी भूमिका निभाना शुरू करती है, तो यह न केवल इन गुणों में भरपूर होती है बल्कि हमेशा इन गुणों को दूसरों के साथ बांटती है। इसे आत्मा की अपेक्षा रहित अवस्था कह सकते है। परिणामस्वरूप, वह लगातार खुश और संतुष्ट होती है।


लेकिन जैसे-जैसे आत्मा कई जन्मों में अपनी भूमिकाएं निभाती जाती है, वह अपने इन ओरिजिनल गुणों को खोने लगती है और इन्हें परमात्मा और अपने आसपास के लोगों से मांगने लगती है।

जिसके कारण वो धीरे-धीरे, अपेक्षा रखना शुरू कर देती है और उसके अंदर इन सात मूल गुण कम होने लगते हैं। ऐसे में आत्मा अपने रिश्तों को अच्छी तरह और सकारात्मक रूप से निभाने में सक्षम नहीं होती और जिसके चलते वो दर्द और पीड़ा का अनुभव करती है। हालांकि पूजा अर्चना के द्वारा यह परमात्मा से कुछ गुण तो प्राप्त कर लेती है, लेकिन यह तब तक संपूर्ण रूप से अपनी मूल अवस्था को नहीं प्राप्त कर सकती, जब तक कि इसे स्वयं का, परमात्मा का और लॉ ऑफ कर्मा का पूरा ज्ञान न हो। इस ज्ञान को ही आध्यात्मिक ज्ञान कहा जाता है और केवल एक परमात्मा ही निरंतर इस सत्य में रहते हैं। परमात्मा इस ज्ञान के द्वारा हमें अपने सभी गुणों और शक्तियों से भरपूर कर देते हैं जिसके परिणामस्वरूप हम वापस श्रेष्ठ बनते जाते हैं।


(कल जारी रहेगा…)


आज का अभ्यास

आज पूरे दिन स्वयं को आत्मा मानकर अपने सात मूल गुणों को याद करें और देखें कि बिना अपेक्षा के व्यवहार करने से मन में कितनी सहज शांति और संतुष्टि बनी रहती है।

आज अभ्यास करूँगा/करूँगी

Previous article
Next article

Articles Ads

Articles Ads 1

Articles Ads 2

Advertisement Ads