*विंध्याचल पर्वत में भदभदा झरना के ऊपर है गुफा,दुर्गम कंकड़ पत्थर भरे रास्तों को नँगे पैर तय कर पहुचे मुनिराज*
*सन्तो की तपोभूमि में पड़े आचार्यश्री के शिष्यों के पावन चरण,महातपस्वी मुनि सहजानन्द जी की तपोभूमि में पहुचे मुनिराज*
*विंध्याचल पर्वत में भदभदा झरना के ऊपर है गुफा,दुर्गम कंकड़ पत्थर भरे रास्तों को नँगे पैर तय कर पहुचे मुनिराज*
सुरेन्द्र जैन "बाड़ी"धरसीवां
देश के ह्रदय प्रदेश के रायसेन जिले की प्राचीन ऐतिहासिक नगरी बाड़ी जिसे सिद्धि प्राप्त सन्तो की तपोभूमि भी कहा जाता है इन दिनों इस युग के महावीर परम पूज्य संत शिरोमणी आचार्यश्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री 108 नेमिसागर जी,मुनिश्री अक्षय सागर जी ,ऐलक श्री 105 उपशम सागर जी के उपसंघ के मंगल सानिध्य से प्रफुल्लित है।
गुरुवार को पूज्य मुनिश्री के उपसंघ में शामिल मुनिराज अतिशय क्षेत्र के उत्तर में स्थित विन्धयाचल पर्वत की भदभदा झरना के ऊपर स्थित गुफा में पहुचे नुकीले कंकड़ पत्थर कांटों भरे रास्तों को नँगे पैर तय कर पूज्य मुनिराज का उपसंघ जैंसे ही गुफा में पहुचा मन को असीम शांति की अनुभूति हुई ।
*क्यों है यह गुफा जैनियो की आस्था का केंद्र*
बाड़ी कलां अतिशय क्षेत्र के उत्तर में स्थित विंध्याचल पर्वत पर भदभदा के ऊपर दो गुफाएं हैं एक छोटी दूसरी बड़ी गुफा दोनो में आज से लगभग 60 साल पहले महातपस्वी पूज्य दिगंबर मुनिराज सहजानन्द जी मुनिराज ने घोर तपस्या की थी यह उन दिनों की बात है जब बाड़ी में विंध्याचल पर्वत के आसपास घनघोर जंगल हुआ करता था और तलहटी में बसे पुरानी बाड़ी तक शेर तेंदुआ आदि वन्य प्राणी पहुच जाते थे उन दिनों सन्तो की तपोभूमि में महातपस्वी मुनि श्री सहजानन्द जी महाराज का मंगल पदार्पण हुआ और पूज्य मुनिराज ने घनघोर जंगल की गुफाओं में वन्य प्राणियों के बीच घोर तपस्या की।
*वनराज देते थे पहरा*
जब पूज्य मुनिराज सहजानन्द जी अंदर तपस्या में लीन रहते थे तब अक्सर गुफा के बाहर शेर शेरनी यानी वनराज गुफा के बाहर अक्सर उस समय समाज के लोगो ने देखे ओर समाज यह देख आश्चर्यचकित रही पूज्य मुनिश्री सुबह अतिशय क्षेत्र में शुद्धि के बाद आहार चर्या को निकलते तदुपरांत समाज को अपने अनमोल वचनों से मार्गदर्शन देते और पुनः मौन व्रत धारण कर जंगल मे प्रवेश कर गुफा में चले जाते थे और तपस्या में लीन हो जाते थे।
लगभग 60 साल पहले जब न कोई जल शुद्धि के यंत्र थे न कोई अजैन छानकर पानी पीने का मतलब जनता था तब मुनिराज ने जल में असंख्य सूक्ष्म जीवों के बारे में अजैनियो को भी बताया ओर लोगों ने लट्ठा के कपड़ा के छन्ना से पानी छानकर पीना शुरू किया।
*आचार्यश्री के चरणों से हुआ अतिशय*
बाड़ी अति प्राचीन धार्मिक नगरी है यहां एक ओर श्री श्री 1008 श्री आदिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र है तो वही दूसरी ओर अयोध्या के खाकी संप्रदाय के महातपस्वी ऋषियों का खाकी अखाड़ा श्री रामजानकी मन्दिर ओर घोर तपस्या से अग्नि रूप में दर्शन कर महंत भगवान दास जी द्वारा स्थापित मां हिंगलाज उपशक्तिपीठ भी है जहाँ से 108 मंदिरों का संचालन होता था और यह महामंडलेश्वर गादी थी बड़ी संख्या में बाल ब्रह्मचारी सन्त महंत श्री खाकी अखाड़ा मन्दिर जी मे रहकर तपस्या ओर प्रभु श्री राम की भक्ति करते थे समय समय पर विशाल धार्मिक आयोजन शतचंडी यज्ञ आदि भी हुआ करते थे ठीक इसी तरह यहां दूधाधारी मठ भी हैं किंबदंती है कि वहां से दूध की धारा निकल पड़ी थी इसलिए उसका नाम दूधाधारी मठ हुआ इसके अलावा और भी बड़ी संख्या में अति प्राचीन धार्मिक स्थल बाड़ी में मौजूद हैं लेकिन यह सभी देखरेख के अभाव में अपनी पहचान खोते जा रहे थे अतिशय क्षेत्र का भी एक मुख्य मंदिर का भाग जीर्ण शीर्ण होकर धराशायी हो चुका था जो बाड़ी कभी कलां के लिए देश दुनिया मे प्रसिद्ध थी और बड़ी संख्या में हर वर्ग के लोग रहते थे उसे न जाने किसकी नजर लगी कि धीरे धीरे प्राचीन बाड़ी अपना अस्तित्व ही खोने लगी और तहसील बरेली चली गई थाना नई बाड़ी आ गया प्राचीन मंदिरों की भी देखरेख सही नही हो रही थी कुल मिलाकर बाड़ी अपना अस्तित्व खोते जा रही थी कि अचानक 18 दिसंबर 1995 को यहां दिगंबर जैनाचार्य 108 विद्यासागरजी का ससंघ मंगल पदार्पण हुआ आचार्यश्री ने अति प्राचीन बड़े बाबा के दर्शन किये समाज को आशीर्वाद के साथ मार्गदर्शन दिया बड़े बाबा मूलनायक की प्रतिमा गढ़वाले से बीच की वेदी पर विराजित की गई उस समय समाज आर्थिक रूप से बहुत कमजोर थी समाज क्या अन्य वर्गों के पास भी कोई खास धंधे पानी निहि थे लेकिन आचार्य श्री के मंगल पदार्पण के बाद ऐंसा अतिशय हुआ कि देखते ही देखते बारना नदी पर पुल बन गया नगर की हर गली में कांक्रीटीकरण हो गया जैन अतिशय क्षेत्र जहां मुनि संघ को ठहरने सन्त निवास धर्मशाला तक नही थी वहां विशाल धर्मशाला बन गई अन्य मंदिरों का भी तेजी से विकास हुआ बाड़ी पुनः तहसील बन गई यानी आचार्यश्री के पावन चरणों के प्रताप से ऐंसा अतिशय हुआ कि बाड़ी का चहुमुखी विकास तेजी से हुआ अब जिला बनने की आश लगाए है बाड़ी।
*बाड़ी मतलब क्षेत्र का सुरक्षा कबच*
18दिसंबर 1995 को बाड़ी में मंगल पदार्पण के बाद 19 दिसंबर को आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज ने अपने अनमोल वचनों में बाड़ी की व्याख्या करते हुए इसे क्षेत्र का सुरक्षा कबच बताया था आचार्यश्री ने कहा था कि किंसान जमीन को बखरता है बीज की बोवनी करता है और जब बीज अंकुरित होने लगते हैं तो फसल की सुरक्षा के लिए क्या लगता है "बाड़ी" यदि बाड़ी न हो तो फसल को कोई भी नुकसान पहुचा सकता है ठीक इसी तरह पुरे क्षेत्र का सुरक्षा कबच है यह बाड़ी यहां लोग बाड़ी बरेली बोलते हैं कोई बरेली बाड़ी नही यानी बाड़ी पहले बोलते हैं।
*समाज की सक्रियता से बन सकता है तीर्थ क्षेत्र*
बाड़ी बहुत प्राचीन क्षेत्र है और यहां आसपास अमरावद में भी हमेशा इसके प्रमाण मिले है कि यह जैन मंदिरों का गढ़ रहा है विध्वंशकारी घटनाओ के समय सँभतः अति प्राचीन मंदिरों का विध्वंश किया गया अब पुनः बाड़ी तीर्थ क्षेत्र के रूप में विकसित हो सकता है जरूरत है जैन समाज को समर्पण सक्रियता के साथ आचार्यश्री से विनती कर पूज्य मुनिराजों का बाड़ी में चौमासा कराने और आचार्यश्री के पावन चरण बाड़ी में पुनः पड़ें इसके लिए प्रयास करने की जरूरत है।



