पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के तृतीय दिवस पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधा सागर जी की अमृत वाणी
पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के तृतीय दिवस पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधा सागर जी की अमृत वाणी
सुरेन्द्र जैन /धरसीवां रायपुर
जाप-ओं ह्रीं उत्तम आर्जवधर्मांगाय नम:
चन्द्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी
**निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्रमण संस्कृति रक्षक108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा*
*आजकल हम बड़े को आहार भोजन कैटर्स बनाकर खिला रहे*
1.विश्वास-आज का धर्म है श्रदेह पर विश्वास करना मेरी दृष्टि में पिता कैसे हैं बहुत अच्छे और पिता की दृष्टि में आप कैसे हो आज उत्तम आर्जव धर्म है वो तिजोरी में ताला लगा रहा है इसका मतलब कि आप पर विश्वास नहीं है इनका विश्वास जीतो इनसे स्पर्धा नहीं करना,मेरा गुरु महान था है और रहेगा अपनों की तरफ चले जब पिता जाग रहा है बेटे के लिए कहा गया था तुझे पता नहीं कितने बज रहे हैं समझ लेना तुम्हें पिता का विश्वास मिला ही नहीं हैं जब तुम्हारे ना आने पर भी पिता चद्दर तानकर सौ रहा है तो समझ लेना तुम्हारे घर में आर्जव धर्म आ गया
2.गुणवान-गुणवान की प्रशंसा तो जगत में होती हैं मेरे से अधिक गुणवान की ऐसी प्रशंसा करें कि हम अपने आप को भूल जाये जब जब किसी गुणवान को देखकर एक आनंद की लहर आ जाये कि दुनिया में कोई तो है जिसके पास गुणों का भंडार हैं बस यही है सबसे बड़ी उपलब्धि बड़ों के प्रति आदर दस उपवास करने वाले महाराज जी को आहार देकर नाच रहा है पेट महाराज का भरा उपवास करने वाला नाच रहा है यहीं हैं भक्त की भक्ति की निशानी है आज का धर्म अदृश्य है धर्म सभा में मुनि श्री ने कहा कि जब भी कोई गुणवान तुम्हें नहीं मिल लेना और तुम्हारे मन में विचार आ जाये तो समझ लेना भगवान के भक्त नहीं सकते नौकर बन सकते हो भक्त नहीं जो व्यक्ति तुम से बड़ा हो उससे पाने की चाह रखी समझ लेना तुम दास बनकर कर रहे हो इनसे हमें क्या मिलेगा घर से लेने के लिए निकले थे दुसरो के सुख में शामिल होकर दिखाओ वो कहलाता है गुणीषु प्रमोदं सूर्य निकलते ही कमल खिल जाता है
किसी भी क्षेत्र में हम से अधिक गुणवान को देखकर गुणवान बने का भाव आता है।
3.परीक्षा के पहले लिखना नकल करना नहीं ये तो होता हैं लेकिन परीक्षा में जो इसने लिखा है वही मैं देखकर ऊतार लू ये नकल कहलाती हैं ये निदनीय हैं भक्ति देखना क्या है मै तो पापी हूँ मैं तो पा नहीं सकता धन्य है प्रभु आपने अनंत चतुष्टय पा लिया जय हो आपकी ये भक्ति है मैं इन्हें सदा आगे देखना चाहते हैं ये कहलाती हैं विनय भक्ति
4.आर्जव-उसको ऐसा आभास हो जाए कि पीछे भी मेरे कोई चल रहा हैं आज के दिन जो है सामने नहीं आता पृष्ठघाती हैं तुम बडे हो बडे चलों पीछे की चिंता मत करो हर व्यक्ति अपने को बुद्धिहीन मानने को तैयार है अपने से छोटे को ज्ञानी मानने को तैयार हैं लेकिन छोटे को बड़ा मानने को तैयार हो जाए तब अंहकार टुट जाता है।
5.हम आगे देख कर चले कोई न कोई आगे दिखेगा और पीछे चलता हुआ दिखेगा हमने किसी को बडा बनाया गुरु बनाया समर्पण,जी हां स्वीकार करेगा विनय करेगा उसके सामने सरल बन जाएगी
*प्रवचन से शिक्षा*-हर व्यक्ति अपने को बुद्धिहीन मानने को तैयार है अपने से छोटे को ज्ञानी मानने को तैयार हैं लेकिन छोटे को बड़ा मानने को तैयार हो जाए तब अंहकार टुट जाता है।
