विचारों के अनुरूप हारमोंस व मुख में लार बनती है उसी अनुसार शरीर का निर्माण होता है। आहार से शरीर ही नहीं मन भी बनता है, जैसा अन्न ,मन वैसा तन--ब्रह्मा कुमार नारायण भाई
विचारों के अनुरूप हारमोंस व मुख में लार बनती है उसी अनुसार शरीर का निर्माण होता है। आहार से शरीर ही नहीं मन भी बनता है, जैसा अन्न ,मन वैसा तन--ब्रह्मा कुमार नारायण भाई
अलीराजपुर
-आहार जीवन का आधार है । सूक्ष्म जीवाणु, हारमोंस, मनुष्य जानवर, पेड़ पौधे सभी भोजन ग्रहण करते हैं ।
हमारा शरीर मन का स्थूल रुप है । ये जो मुख में थूक बनती है, ये विचारो का तरल रुप है । ये तरल पेट में जाता रहता है और वहां खाने में मिल कर सारे शरीर के निर्माण में लगा रहता है । ऐसे ही हमारे शरीर में जो हार्मोन बन रहे है वह भी विचारो के प्रभाव से बनते है और यह हार्मोन शरीर के भिन्न भिन्न अंगो का निर्माण कर रहा है ।भोजन एक ऐसी चीज़ है जिसके स्थूल भाग से शरीर बनता है और सूक्ष्म भाग से मन बनता है । ऐसे भोजन और दिमाग का एक दूसरे पर गहरा असर पड़ता है । आहार से रक्त ही नहीं मन भी बनता है । यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रह्माकुमार नारायण भाई ने महात्मा गांधी मार्ग पर स्थित ब्रह्माकुमारी सभागृह में भोजन का तन व मन पर प्रभाव विषय पर नगर वासियों को संबोधित करते हुए बताया कि
तामसिक आहार वह भोजन है जो मन को नाकारात्मक विचारो के लिये उतेजित करता है । मिर्ची, खट्टी चीजे, हींग, इमली, प्याज, लहसुन, चीनी, चाय, काफी, मांस अंडे और नशीले पदार्थ ये सब तामसिक भोजन है । तीन घंटे से ज्यादा देर तक रखा गया भोजन भी तामसिक है । ये बिस्कुट, ब्रेड, मठ्ठी तथा इस तरह की अन्य चीजे आदि सब तामसिक है ।इन में से कुछ जैसे चाय, काफी, हींग इमली आदि कम तामसिक हैं . परंतु यह शरीर के लिये ज़रूरी हैं इस लिये इन का प्रयोग निषेध नहीं किया गया । फिर भी यह जितना कम हो सके अच्छा है ।राजसिक आहार वह आहार है जिस से हम शक्तिशाली बनते है तथा दूसरो पर या जिनके हम मुखिया है उन पर राज करना चाहते है । घी, तेल, माखन, तथा पकवान व मिठाईया ये सब रजोगुणी भोजन है । ये सारी दुनिया खाती है । इसलिये हरेक मनुष्य स्वभाव से दूसरो पर प्रशासन करना चाहता है । बडी मच्छ्ली छोटी को खाती है ।
सात्विक भोजन वह है जिस से हमारे में सतोगुणी विचार उत्पन्न होते हैं । हम दूसरो को सुख देना चाहते हैं । फल फ्रूट्, हरी सब्जियां, सादी दालरोटी व दूध और ड्राइ फ्रूट ये सब सात्विक भोजन हैं । महान योगी बनने के लिये सात्विक भोजन का प्रयोग करें ।
भोजन के पदार्थों को प्राप्त करने के लिये धन भी सात्विक होना चाहिये । अगर गलत पैसे से भोज्य पदार्थ खरीदेगे तो यह तामसिक आहार होगा वह चाहे फल व सब्जियां हों । मन दूषित होगा । यही मनुष्य के पतन का कारण बनता है । बाबा के पास जो अनन्य बच्चे थे उनके धन से रसोई का कार्य करते थे । जो भी व्यक्ति व संस्था पैसे के नियम का उलंघन करेगा उसकी आन्तरिक उन्नति रुक जायेगी । बाहर से उसके ठाठ बाठ होंगे परंतु प्यार से वंचित होगा । सदा मन से परेशान रहेगा ।
भोजन बनाने वाला भी सात्विक होना चाहिये । जो व्यक्ति भोजन बनाता /बनाती है उसके अवगुण उस भोजन में प्रवेश कर जाते हैं और भोजन तामसिक बन जाता है । आज संसार में दुखों का एक यह भी कारण है कि वह ऐसे लोगो के हाथ से बना खाना खा रहे हैं जो दुखों से भरपूर हैं । जो भोजन बनाता है उसे कभी डांट नहीं मारो, बदसलूकी नहीं करो । थोड़ी देर खाने के रुप में तुम्हे वापिस परोस देगी । श्रेष्ट योगी बनने के लिये कोशिश करो दो रोटी खुद बना कर खाओ । कार्यक्रम की अंत में सभी को गहन शांति के लिए राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास कराया गया ।ब्रहमा कुमार अर्जुन भाई ने सुंदर गीत स्वागत में प्रस्तुत किया। ब्रह्माकुमारी ज्योति ने सभी का आभार व्यक्त किया।