जब हम किसी से नफरत करते हैं तो उसका रिटर्न्स हमारे पास बीमारी के रूप में आता है , जब किसी को क्षमा करते हैं तो हमारा बीमार तन स्वस्थ होने लगता है--ब्रहमा कुमार नारायण भाई - fastnewsharpal.com
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जब हम किसी से नफरत करते हैं तो उसका रिटर्न्स हमारे पास बीमारी के रूप में आता है , जब किसी को क्षमा करते हैं तो हमारा बीमार तन स्वस्थ होने लगता है--ब्रहमा कुमार नारायण भाई

 जब हम किसी से नफरत करते हैं तो उसका रिटर्न्स हमारे पास बीमारी के रूप में आता है , जब किसी को क्षमा करते हैं तो हमारा बीमार तन स्वस्थ होने लगता है--ब्रहमा कुमार नारायण भाई




अलीराजपुर 

 हमारे सोचने, बोलने और करने से जो शक्ति पैदा होती है, वह हमारा कर्म बनाती है। मैं किसी व्यक्ति से कैसे बात करूं यह मेरा कर्म है। और कोई व्यक्ति मुझसे कैसे बात करेगा यह मेरा भाग्य है। आप किसी पर विश्वास करें ये आपका कर्म। वो आप पर विश्वास करे या धोखा दे वह आपका भाग्य है। अब दिनभर में जो शक्ति हमारे पास लोगों के व्यवहार, परिस्थिति के रूप में आती है, यह हमारे कर्म का फल है, हमारा भाग्य है। हमारे पास जो है वह हमारी  भेजी हुई हुई शक्ति का रिटर्न है। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रहमा कुमार नारायण भाई ने शहर वासियों को वर्तमान समय बढ़ते हुए तनाव चिंता के कारणों पर नगरवासियों को संबोधित करते हुए बताया कि समझने की बात यह है कि सब कुछ जो हमारे पास बाहर से आ रहा है, वह उसी का रिटर्न है जो एनर्जी हमने बाहर भेजी थी।

 ठीक वैसे जैसे हम एक गेंद को दीवार पर फेंकते हैं तो वह लौटकर हमारे पास ही आती है। हम अपने कर्म के भाग्य से, भाग नहीं सकते हैं। किसी ने मुझे कुछ बुरा कहा, हम इस शक्ति का कुछ नहीं कर सकते हैं। लेकिन हमारी पकड़ गेंद पर तभी तक थी जब तक उसे फेंका नहीं गया था। लेकिन, जब कोई मेरी बेइज्जती करेगा तो मैं क्या सोचूंगी, कैसा व्यवहार करूंगी यह पूरी तरह से मेरे हाथ में है। मेरी सोच, बोल और प्रतिक्रिया एक नई गेंद है, जो मैंने उसी क्षण फेंकी है। अगर वापस मैंने भी गुस्सा किया तो मैंने एक काले रंग की गेंद वापस भेज दी है।

 अगर मैं शांत रही, प्यार से बात की, तो मैंने सफेद रंग की गेंद भेज दी। नया कर्म कौन-सा करना है वह पूरी तरह से मेरे हाथ में है। लेकिन होता क्या है- 'उसने ऐसा क्यों कहा, उसने ऐसा क्यों किया'? ये सब करते-करते नई गेंद भी काले रंग की हो जाती है।

 पहले हमने काली गेंद भेजी थी इसलिए वैसी ही आई थी। अब फिर से वही भेज देंगे, तो फिर से वही लौटेगी। इस तरह से करते-करते घोर कलयुग आ गया और इस तरह से पूरा समाज काला हो गया। कोई मेरे साथ गलत करे और मैं उसके लिए दुआ करूं, क्या यह संभव है❓ सबसे बड़ी कठिनाई है अहम। जिसने मेरे साथ गलत किया उसके लिए बुरा सोचना सामान्य और स्वाभाविक है। सोचते-सोचते लोग कहते हैं भगवान इसको इस कर्म की सजा जरूर देगा। हम भगवान से उसका कुछ बुरा करने को कहते हैं। ये सारे काली गेंद भेज रहे हैं। अगर मुझे कोई नफरत की, गुस्से की, शक्तियां भेज रहा है तो इसका मतलब है कि कभी न कभी मेरी तरफ से ऐसी शक्ति गई थी।

 अब हम उसे बदल नहीं सकते हैं। लेकिन अब जब हम उनके लिए सोच रहे हैं तो ये भी सोच सकते हैं कि हिसाब-किताब आया था, खत्म हुआ। मेरे पिछले कर्मों का कोई कर्ज था चुकता हो गया। अब मेरा भी बहुत अच्छा चले और इसका भी। किसी के लिए बुरा सोचने की कोई सीमा नहीं होती है उसी तरह अच्छा सोचने की भी नहीं है। जरूरत है कि थोड़ा-सा अहंकार दबा के, खुद पर थोड़ी-सी मेहनत करके, प्यार से खुद को रोक लें। जब हम किसी से नफरत करते हैं, तो मन की खुशी गायब हो जाती है। शरीर में कोई न कोई बीमारी लग जाती ।अगर हम कहें, बात खत्म हुई, क्षमा करो आगे बढ़ो। तो शरीर स्वस्थ हो जाएगा. क्योंकि, सफेद गेंद भेजी तो लौटकर भी तो वही आयेगी। ब्रह्मा कुमारी माधुरी बहन ने सभी का स्वागत किया। कार्यक्रम के अंत में शरद पूर्णिमा के अवसर पर सभी को भोग वितरित किया गया। ब्रह्मा कुमार अर्जुन भाई ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया।

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