लिफापा दीवाली ओर दिवाला....सुरेन्द्र की कलम से
लिफापा दीवाली ओर दिवाला....सुरेन्द्र की कलम से
सुरेन्द जैन/धरसींवा
हमारे देश प्रदेश में लिफापा कुसंस्कृति का जिस तेजी से विकास हुआ है उसी तेजी के साथ गरीब मजदूरों का शोषण उधोगो में बढ़ा है आख़िर क्या है लिफापा कुसंस्कृति ओर कोशिश करते हैं इस लेख के माध्यम से की उन लिफापों में किनका खून पसीना भरा रहता है
तो चलो चलते हैं हम ऐंसी जगह जहां छोटे बड़े उधोग ग्रामीणों की जमीनें अधिग्रहण कर स्थापित हुए हैं, जहां जहां ग्रामीण किसानो की भूमि अधिग्रहण कर उधोग लगाए गए वहां किसानो के परिजनो को उन उधोगों में कोई अच्छा काम नही मिला बल्कि उन्हें ठेकेदारों के अधीन मजदूरी का काम ही मिला है, अब मजदूरी के काम मे तो पसीना बहाना ही पड़ता है लेकिन पसीना बहाने के बाद भी उन्हें कभी निर्धारित मजदूरी पूरी नही मिलती जबकि मजदूरों का शोषण बन्द कराने के नाम पर अनगिनत संगठन अब तक बन चुके हैं जो समय समय पर सुर्खियां भी बटोरते हैं ,
धरना प्रदर्शन रैली सभाओं आदि के नाम पर जहां राजनीतिक दलों के लोग समय समय पर उधोगो से सहयोग लेते हैं तो वही धार्मिक आयोजनो के लिए भी सहयोग की अपेक्षा के साथ लोग उधोगो में जाते हैं यह बात अलग है कि धार्मिक आयोजनों के लिए राजनीतिकों की अपेक्षा बहुत कम ही सहयोग मिलता है और सालाना दीवाली पर तो लिफापा कुसंस्कृति चलती है लेकिन ये लिफापा कुसंस्कृति सभी के लिए नही बल्कि राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों अधिकारी कर्मचारियो ग्रामीण जनप्रतिनिधियों ओर समय समय पर मजदूरों की आवाज बुलंद करने वालों तक रहती है,
चलिए अब आते हैं मुख्य बिंदु पर की लिफापों में किनका खून पसीना होता है तो इसके लिए हमे मजदूरों के शोषण की तरफ नजर डालना होगा,
यदि हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के आसपास के उधोगो पर ही नजर डालें तो प्रत्येक गांव से सौ से पांच सौ तक ग्रामीण महिलाएं एवं पुरुष उधोगों में मेहनत मजदूरी करने जाते हैं जिन्हें निर्धारित रेट से सौ से डेढ़ सौ रुपये तक कम मजदूरी मिलती है यदि हम विभिन्न उधोगो में काम करने वाले स्थानीय ग्रामीण मजदूरों की संख्या उरला सिलतरा में दस हजार भी मानकर टोटल लगाएं ओर निर्धारित से सौ रुपये कम मजदूरी से भी शोषण को देखें तो दस हजार गुणित सौ करने पर दस लाख रुपये रोज का शोषण होता है, उरला धरसीवां क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों से अलग अलग उधोगों में कम से कम इतने लोग तो काम पर जाते ही हैं जिसमे महिलाओं की संख्या सर्वाधिक होती है लेकिन शोषण के बारे में यदि कोई महिला मजदूर सत्य बता दे तो संबंधित उधोग से लेबर ठेकेदार उसकी छुट्टी कर देते हैं इसलिए अब तो महिला मजदूर भी सत्य बताने में डरती हैं कि कहीं सत्य बोलने से उन्हें जो मिल रहा बो भी बन्द न हो जाये,
अब यदि एक दिन में गरीब मजदूरों की खून पसीने की दस लाख की कमाई को डकारा जाता है तो ये दस दिन में एक करोड़ माहभर में तीन करोड़ ओर सालाना 36 करोड़ के आसपास होती है अब सोचने वाली बात ये है कि दीवाली के लिफापों में जो मौजूद रहता है वह किनका खून पसीना है किनका दिवाला निकला जब वो लिफापे तैयार हुए शायद इसीलिए तरह तरह के संगठनों की बाढ़ आने के बाद भी उधोगों में ग्रामीण मजदूरों का शोषण बन्द नही हुआ है न भविष्य में ऐंसी कोई उम्मीद है क्योकि दुनिया सुधर जाए पर हम नहीं सुधरेंगे,ओर जब तक हम नही सुधरेंगे गरीब मेहनतकश मजदूरों के दिन कैंसे सुधरेंगे।