आज का सुविचार(चिन्तन)
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💠 *Aaj_Ka_Vichar*💠
🎋 *..18-07-2021*..🎋
✍🏻समय और शब्द दोनो का उपयोग लापरवाही के साथ न करें, कयोंकि ये दोनो दुबारा नही आते हैं न मौका देते हैं।
💐 *Brahma Kumaris* 💐
🌷 *σм ѕнαитι*🌷
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💥 *विचार परिवर्तन*💥
✍🏻हमें जो मिला है हमारे भाग्य से ज्यादा मिला है यदि आपके पाँव में जूते नहीं है तो अफसोस मत कीजिए दुनिया में कोई लोग के पास तो पाँव भी नहीं है।
🌹 *σм ѕнαитι.*🌹
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🙏 *ॐ शांति* 🙏
जो परमानंद *परमात्म* मिलन में है.... वह *संसार* के किसी भी मिलाप में नहीं, क्योंकि आनन्द का आधार है आंतरिक शुद्धता... जब हम *अशुद्ध* आत्माएं परम शुद्ध परमात्मा से *मिलन* मनाती हैं तो हम भी शुद्ध होने लगती हैं और जीवन में *परमानंद* का *अनुभव* होने लगता है।
🌸 सुप्रभात...
💐💐 आपका दिन शुभ हो... 💐💐
*प्रेरक प्रसंग - ।। जैसा अन्न वैसा मन ।।*
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एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी।
अब यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाता है?
तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए, ऋषि ने पूछा कि भगवन! जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ?
भगवन ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते है, दोनों लोग गंगा जी के पास गए और कहा कि "हे गंगे ! जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते है तो इसका मतलब आप भी पापी हुई !"
गंगा जी ने कहा "मैं क्यों पापी हुई, मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ!"
अब वे लोग समुद्र के पास गए, "हे सागर! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए!"
समुद्र ने कहा "मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ!"
अब वे लोग बादल के पास गए और कहा "हे बादलो! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है, तो इसका मतलब आप पापी हुए!"
बादलों ने कहा "मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ, जिससे अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है, उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है व जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है!"
अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसे ही विचार मानव के बन जाते है! इसीलिये सदैव भोजन सिमरन और शांत अवस्था मे करना चाहिए और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए!
भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े प्राण त्यागने के लिए शुक्लपक्ष के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर उनसे प्रतिदिन नीति ज्ञान लेते थे। द्रौपदी कभी नहीं जाती थीं।
इससे भीष्म के मन में पीड़ा थी। श्रीकृष्ण ने भांप लिया था। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा- "अंतकाल की प्रतीक्षा में साधनारत पूर्वज से सपरिवार मिलना चाहिए। परिवार पत्नी के बिना पूर्ण नहीं है।"
इशारा समझकर युधिष्ठिर जिद करके द्रौपदी को भी साथ ले गए। पितामह उन्हें नीति ज्ञान देने लगे। द्रौपदी कुंठित होकर चुपचाप सुन रही थी। अचानक द्रोपदी को हंसी आ गई।
भीष्म ने कहा- पुत्री तुम्हारे हंसने का कारण मैं जानता हूँ। द्रोपदी सकुचाई तब भीष्म ने कहा- पुत्री तुम अपने मन की दुविधा पूछ ही लो। मुझे भी शांति मिलेगी।
द्रोपदी ने कहा- "स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भीष्म के समान नीति का ज्ञाता दूसरा कोई नहीं किंतु आपका ज्ञान कहां लुप्त हो गया था जब पुत्रवधू आपके सामने निवस्त्र की जा रही थी?
भीष्म ने कहा- इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी। जैसा अन्न वैसा मन। मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी का अन्न खा रहा था। उस अन्न ने मेरी बुद्धि जड़ कर दी थी। सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो गई थी। अन्न ही रक्त का कारक है। अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह रक्त धीरे-धीरे करके निकाल दिया है। अब इस शरीर में सिर्फ गंगापुत्र भीष्म शेष है। सिर्फ माता का अंश है जो सबको निर्मल करती हैं इसलिए मैं नीति की बातें कर पा रहा हूँ।
भीष्म की बात को अटल सत्य समझिए। दुराचार से या किसी को सताकर कमाए गए धन से यदि परिवार का पालन करते हैं तो वह परिवार की बुद्धि भ्रष्ट करता है। उससे जो सुख है, वह क्षणिक है किंतु लंबे समय में वह दुख का कारण बनता है। यदि आपके सामने गलत तरीके से पैसा कमाकर भी कोई फल-फूल रहा है तो यह समझिए कि वे उसके पूर्वजन्म के संचित पुण्य हैं जिसे निगल रहा है। जैसे ही वे पुण्य कर्म समाप्त होंगे, उसके दुर्दिन आरंभ होंगे।
अतः अपने कमाए धन को और ज्यादा शुद्ध एवम पाप मुक्त करने के लिए कुछ प्रतिशत दान देने में लगाए। धन ऐसी जगह दिया जाए, जहां से वापस आने की कामना न हो। दूसरी बात, कभी इस बात का किसी से जिक्र न किया जाए। तीसरी बात, मन में कभी अभिमान न लिया जाए। इसे एक लाइन में कहना हो तो "नेकी कर दरिया में डाल" वाली कहावत चरितार्थ होनी चाहिए।





