जो मन से नहीं हारता वह बुझे दीपकों को जला सकता है। कोई साथी बने या न बनें अपने मन को साथी बनाइए--- ब्रहमा कुमार नारायण भाई
जो मन से नहीं हारता वह बुझे दीपकों को जला सकता है। कोई साथी बने या न बनें अपने मन को साथी बनाइए
ब्रहमा कुमार नारायण भाई
अलीराजपुर,
जीवन में बाहर की हार जीत नहीं अन्दर की हार जीत प्रकर्ति तय करती है क्योंकि आप तब तक नहीं हारते जब तक आप मन से नहीं हारते।
शरीर को सजाने से अधिक मन की सजावट पर ध्यान दिया जाए तो बाहरी सुन्दरता पर मेहनत नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि सुन्दर मन के पास तन भी सुन्दर ही होता है यह निश्चित है। कितनी भी बड़ी मुसीबत हो,जो मन से नहीं हारता वह जीवन के हर बुझे दीपक को फिर से जला सकता है। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रहमा कुमार नारायण भाई ने बूझे हुए चिराग कैसे जलाएं? विषय पर महात्मा गांधी मार्ग पर स्तिथ ब्रहमा कुमारी सभागृह में नगर वासियों को संबोधित करते हुए बताया कि
कोई भी कठिनाई वास्तव में आपके द्वारा भेजी गई नाकारात्मक उर्जा है उस से बचने के लिए पुण्य कर्म की कमाई व प्यारे प्रभू की याद को अपना नियम बना लें डूबती नैया किनारे लग सकती है।कुछ लोग छोटी छोटी बातों पर निराश हो जाते हैं और कुछ बड़ी बड़ी बातों पर भी स्थिर रहते हैं यह आत्मिक बल के कारण है जिसका आधार है मन,वचन व कर्म की पवित्रता ।कोई साथी बने न बने अपने मन को साथी बनाना सिखिये क्योंकि इसके साथ से तो भगवान भी मित्र बन सकता है। मन को साथी बनाने का अर्थ है उसे अपने हित के अनुरूप चलाना और अपना हित तो केवल परमात्म श्रीमत में है।
• परमात्मा के बिना इस संसार रूपी भवसागर को पार करना मुश्किल नहीं असम्भव है।
_*क्या फर्क पड़ता है लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं, फर्क तो पड़ता है भाई यदि आप अपने बारे में नहीं सोचे । इस अवसर पर ब्रह्मा कुमारी माधुरी बहन ने मन का पंछी को पिंजरे से कैसे आजाद करे अपना अनुभव बताया कि
मन की बेचैनी और उदासी का मुख्य कारण है मन हर समय कुछ ना कुछ व्यर्थ सोचता ही रहता है। जितने संकलप कम और शुभ होंगे मन उतना ही आजाद महसूस करेगा।
इसलिए:-
आज से हम परमात्मा की और ध्यान लगाकर मन के व्यर्थ संकल्पों रूपी पिंजरे को तोड़े व शुभ और जरूरी संकल्प कर मन का पंछी आजाद करें।
कहते हैं कि:-
उड़ना तो आता है,,,, लेकिन आजाद होना नहीं आता!
ए मन के पंछी,,, तुझे खुद के पिंजरे से ही निकलना नहीं आता